सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: चोरी हुए वाहन के बीमा दावे की राशि पर फाइनेंसर का अधिकार नहीं…

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में ये बात स्पष्ट की है कि वाहन मालिक जिस वाहन को पैसा न चुका पाने पर फाइनेंसर को सौंप चुका है, उसके चोरी होने पर फाइनेंसर बीमा कंपनी से नुकसान भरपाई का दावा नहीं कर सकता।

कोर्ट ने कहा कि कानून की यह तय स्थिति है कि बीमा अनुबंध सिर्फ बीमा कराने वाले व्यक्ति और बीमा कंपनी के बीच निजी कांट्रेक्ट होता है और कोई तीसरा पक्ष उस कांट्रेक्ट के आधार पर कोई दावा नहीं कर सकता।

अगर यह मान भी लिया जाए कि बीमा कराने वाले व्यक्ति ने गाड़ी अपीलकर्ता (फाइनेंसर) को सौंप भी दी थी, तब भी यह बात बनी रहती है कि अपीलकर्ता (फाइनेंसर) को गाड़ी का मालिक नहीं माना जा सकता, और इसलिए बीमा कंपनी को फाइनेंसर को नुकसान की भरपाई करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

क्या है पूरा मामला?

यह फैसला जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के फैसले को सही ठहराते हुए सुनाया है। कोर्ट ने आयोग के फैसले के खिलाफ दाखिल अपील खारिज कर दी है।

कर्नाटक के मैसुरु के इस मामले में सोमशेखर ने के. प्रकाशचंद्र से पैसे लेकर यानी फाइनेंस करा कर गाड़ी खरीदी। गाड़ी का बीमा भी कराया। लेकिन, बाद में आर्थिक तंगी के चलते वह कर्ज का भुगतान नहीं कर पाया और उसने 13 दिसंबर, 2003 को गाड़ी फाइनेंसर को सौंप दी।

आरोपों के मुताबिक, जब वो गाड़ी फाइनेंसर के पास थी, चोरी हो गई। जिसकी एफआइआर हुई, लेकिन पुलिस गाड़ी नहीं ढूंढ पाई और क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। इसके बाद फाइनेंसर ने बीमा कंपनी से गाड़ी का क्लेम मांगा। मगर बीमा कंपनी ने क्लेम खारिज कर दिया।

इसके बाद अपीलकर्ता फाइनेंसर ने सेवा में कमी के लिए जिला उपभोक्ता फोरम के सामने शिकायत की और मुआवजा दिलाने की मांग की।

बीमा कंपनी की दलील बीमा कंपनी की दलील थी कि अपीलकर्ता बीमा कंपनी और वाहन मालिक के बीच हुए कॉन्ट्रेक्ट का हिस्सा नहीं था, इसलिए वह सेवा में कमी का जिम्मेदार नहीं है और न ही अपीलकर्ता द्वारा वाहन उसे सौंपे जाने का कोई दस्तावेज ही दिया गया है। लेकिन, जिला उपभोक्ता फोरम ने बीमा कंपनी को दो महीने के भीतर 5,27,850 रुपये देने का आदेश दिया।

बीमा कंपनी ने आदेश को राज्य उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी, मगर राज्य आयोग ने अपील खारिज कर दी। इसके बाद बीमा कंपनी ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में पुनर्विचार याचिका दाखिल की।

राष्ट्रीय आयोग ने उपभोक्ता फोरम और राज्य आयोग का आदेश खारिज करते हुए कहा कि बीमा कंपनी को क्लेम देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय आयोग के फैसले को अपीलकर्ता फाइनेंसर ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी जिसे उसने खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय आयोग के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि अपीलकर्ता और बीमा कंपनी के बीच अनुबंध न होने की स्थिति में अपीलकर्ता के कब्जे से वाहन चोरी होने पर बीमा कंपनी पर जिम्मेदारी डालना उचित नहीं होगा।

कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय आयोग का यह कहना बिल्कुल सही है कि बीमा कंपनी को दावा स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, क्योंकि अपीलकर्ता, बीमा कंपनी और बीमित व्यक्ति के बीच हुए अनुबंध का हिस्सा नहीं है।

अपीलकर्ता और बीमा कंपनी के बीच कोई अनुबंध का संबंध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसलिए उसे राष्ट्रीय आयोग के फैसले में दखल देने का कोई ठोस कारण नहीं दिखता।

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