देशद्रोह कानून (धारा 124ए) पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और मानवीय फैसला सुनाया है। इसने स्पष्ट किया है कि यदि आरोपित को कोई आपत्ति न हो, तो अदालतें देशद्रोह से जुड़े मामलों की सुनवाई और ट्रायल को आगे बढ़ा सकती हैं।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह व्यवस्था 17 साल से जेल में बंद एक आरोपित की याचिका पर सुनवाई करते हुए दी। इस आरोपित की अपील मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में लंबित है, और उसने गुहार लगाई थी कि वह अपना फैसला चाहता है ताकि इस अनिश्चितता से मुक्ति मिल सके।
सलाखों के पीछे बीते 17 साल का दर्द सुप्रीम कोर्ट ने आरोपित के इस दर्द को समझा और कहा कि जहां खुद आरोपित को धारा 124ए के तहत चल रही अपील या ट्रायल से कोई आपत्ति नहीं है, वहां अदालतों के लिए मामले का गुण-दोष (मेरिट) के आधार पर फैसला करने में कोई कानूनी अड़चन नहीं होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह इस याचिकाकर्ता की अपील पर जल्द से जल्द कानून के मुताबिक फैसला करे। औपनिवेशिक दौर के कानून पर पहले लगी थी रोक गौरतलब है कि 11 मई 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश के जरिये इस औपनिवेशिक कानून पर रोक लगा दी थी।
केंद्र सरकार द्वारा कानून की समीक्षा किए जाने तक नई एफआइआर दर्ज करने और लंबित मामलों की कार्यवाही पर अंतरिम रोक थी। जेल में बंद लोगों को जमानत के लिए कोर्ट जाने की छूट दी गई थी। 1890 में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की आवाज दबाने के लिए बनाए गए इस कानून की लंबे समय से आलोचना हो रही थी।
एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी समेत कई दिग्गजों ने इसके दुरुपयोग के खिलाफ याचिकाएं दायर की हैं। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के नए रुख से उन कैदियों को बड़ी राहत मिलेगी जो सालों से सिर्फ इसलिए जेल में हैं क्योंकि उनके मामलों पर सुनवाई रुकी हुई थी।