पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी पैनल में शामिल अस्पताल अब मरीजों को कम कीमत वाले आकर्षक पैकेज दिखाकर बाद में इलाज के आवश्यक हिस्सों के नाम पर अतिरिक्त और छिपे हुए बिल नहीं थमा सकेंगे।
अदालत ने इस प्रवृत्ति पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि चिकित्सा सेवा कोई व्यावसायिक जाल नहीं, बल्कि भरोसे और पारदर्शिता का क्षेत्र है।
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने अपने विस्तृत आदेश में हरियाणा के स्वास्थ्य महानिदेशक को निर्देश दिया कि राज्य के सभी पैनल अस्पतालों की पैकेज दरों की व्यक्तिगत रूप से या संबंधित सिविल सर्जन के माध्यम से जांच कराई जाए।
यदि कोई अस्पताल नीति के विरुद्ध जाकर मरीजों से अनुचित वसूली करता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी, जिसमें लाइसेंस रद करना भी शामिल हो सकता है। अदालत ने पूरी प्रक्रिया तीन महीने में पूरी कर अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।
हाई कोर्ट ने क्या चिंता जताई?
हाई कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि कई अस्पताल मरीजों या उनके परिजनों को बिना समुचित जानकारी दिए केवल छपे हुए फार्म पर हस्ताक्षर करवा लेते हैं। अदालत ने कहा कि इलाज की लागत, पैकेज में शामिल सुविधाएं और संभावित अतिरिक्त प्रक्रियाओं की जानकारी मरीज या उसके परिजन को उनकी समझ की भाषा में स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए।
केवल औपचारिक हस्ताक्षर लेकर जिम्मेदारी पूरी मान लेना स्वीकार्य नहीं होगा। जस्टिस बराड़ ने अपने आदेश में कहा कि इलाज की लागत को मरीज या उसके निकट संबंधी को ऐसी भाषा में समझाया जाए, जिसे वे समझते हों। केवल साइक्लोस्टाइल्ड प्रोफार्मा पर हस्ताक्षर करवाने की प्रथा पर्याप्त नहीं है।
मरीजों को पहले कम पैकेज दिखाकर आकर्षित करना और बाद में उपचार के आवश्यक हिस्सों के लिए अलग से शुल्क वसूलना किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई चिकित्सा प्रक्रिया जीवन बचाने के लिए आवश्यक और आपातकालीन थी, तो उसका खर्च प्रतिपूर्ति योग्य होगा।
राज्य सरकार को क्या कहा?
राज्य यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि मरीज ने पारंपरिक प्रक्रिया नहीं अपनाई। कोर्ट ने कहा कि चिकित्सा नीति में करुणा सर्वोपरि होनी चाहिए, व्यापारिक लाभ नहीं। यह फैसला अब मरीजों के अधिकार, पारदर्शी स्वास्थ्य व्यवस्था और अस्पतालों की जवाबदेही को लेकर एक बड़ी न्यायिक चेतावनी माना जा रहा है।
क्या कोई सरकार सिर्फ इसलिए किसी गंभीर हृदय रोगी का मेडिकल खर्च लौटाने से इनकार कर सकती है क्योंकि उसे बचाने के लिए अपनाई गई आधुनिक तकनीक सरकारी पैकेज सूची में दर्ज नहीं थी?
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने इस सवाल पर मानवीय और कड़ा रुख अपनाते स्पष्ट कर दिया कि जब किसी मरीज की जान बचाने के लिए डाक्टर पारंपरिक प्रक्रिया की बजाय उन्नत उपचार को आवश्यक मानें, तब राज्य “यह पैकेज में नहीं है” कहकर जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।
अदालत ने कहा कि जीवनरक्षक चिकित्सा नीति को तकनीकी अस्वीकृति का औजार नहीं बनाया जा सकता। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने गंभीर कोरोनरी आर्टरी डिजीज से पीड़ित एक मरीज के मामले में राज्य सरकार के रुख को कठोर शब्दों में खारिज करते पूरा मेडिकल बिल ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया।
सरकार को क्या निर्देश दिया?
साथ ही सरकार को निर्देश दिया कि कोरोनरी आर्टरी डिजीज के उपचार हेतु पैकेज दरों में इंट्रावास्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक को शामिल करने पर विचार कर नीति में आवश्यक संशोधन करें। मामले में मरीज की धमनियां अत्यधिक कैल्सीफाइड थीं, जिस कारण सामान्य एंजियोप्लास्टी प्रभावी नहीं थी।
चिकित्सकों ने स्पष्ट किया कि मरीज की जान बचाने के लिए रोटाब्लेशन और आइवीएल जैसी उन्नत तकनीक ही एकमात्र व्यवहारिक विकल्प थी। बावजूद सरकार ने यह कहते खर्च लौटाने से इनकार कर दिया कि आइवीएल पैकेज सूची का हिस्सा नहीं है और इसमें प्रयुक्त उपकरण सामान्य एंजियोप्लास्टी से अलग श्रेणी में आते हैं।
इस पर हाई कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पारंपरिक एंजियोप्लास्टी असफल होती, फिर भी केवल सूची में होने के कारण सरकार उसका भुगतान कर देती, लेकिन प्रभावी जीवनरक्षक उपचार को सिर्फ तकनीकी वर्गीकरण के आधार पर अस्वीकार करना “खोखला दृष्टिकोण” है।
‘हर ताले की अपनी चाबी होती है’
अदालत ने कहा कि “हर ताले की अपनी चाबी होती है, हर बीमारी का अपना उपचार। कसौटी यह नहीं हो सकती कि सूची में क्या दर्ज है, बल्कि यह होनी चाहिए कि जीवन बचाने के लिए चिकित्सकीय रूप से क्या आवश्यक है।
हाई कोर्ट ने माना कि राज्य ने नीति की भावना को छोड़ केवल शब्दशः व्याख्या अपनाई, जबकि कल्याणकारी राज्य की चिकित्सा नीति का मूल उद्देश्य जीवन की रक्षा है। कहा कि “करुणा को तकनीकीता की वेदी पर बलि नहीं चढ़ाया जा सकता।