गोरखपुर को पर्यटन के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने वाली एक और महत्वाकांक्षी परियोजना जल्द आकार लेने जा रही है। राजघाट से डोमिनगढ़ तक राप्ती नदी के किनारे करीब 3.5 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में लखनऊ के गोमती रिवर फ्रंट की तर्ज पर राप्तीरिवर फ्रंट विकसित किया जाएगा।
करीब 1303 करोड़ रुपये लागत वाली इस परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) तैयार करा चुका है। अब सिंचाई विभाग के साथ तकनीकी विमर्श के बाद परियोजना को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू होगी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर इस परियोजना की रूपरेखा तैयार की गई थी। इसके लिए जीडीए ने रिक्वेस्ट फार प्रपोजल (आरएफपी) के माध्यम से वाराणसी की एक विशेषज्ञ फर्म का चयन किया, जिसने नमो घाट का भी विकास किया है। विस्तृत सर्वेक्षण के बाद फर्म ने डीपीआर तैयार कर जीडीए को सौंप दी है।
योजना के अनुसार राप्ती नदी के तट से हार्बर्ट बांध स्थित फोरलेन सड़क तक लगभग 150 मीटर चौड़ाई वाले क्षेत्र का विकास तीन चरणों में किया जाएगा। पहले चरण में अर्बन हाट और ईको पार्क विकसित होंगे, जहां लोगों के लिए मनोरंजन और प्राकृतिक वातावरण उपलब्ध कराया जाएगा।
दूसरे चरण में फोरलेन सड़क से सार्वजनिक प्रवेश मार्ग बनाया जाएगा तथा योगा सेंटर जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी। तीसरे चरण में प्रगति मैदान की तर्ज पर अत्याधुनिक कन्वेंशन सेंटर बनाया जाएगा, जहां बड़े स्तर के सम्मेलन, प्रदर्शनियां और अन्य आयोजन हो सकेंगे।
परियोजना के तहत नदी किनारे सड़क, नालियां, लैंडस्केपिंग, पार्क, कियोस्क और खुले सार्वजनिक स्थल भी विकसित किए जाएंगे। इसके अलावा राप्ती नदी में विभिन्न स्थानों पर बोटिंग की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए प्लेटफार्म बनाए जाएंगे और पर्यटकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक इंतजाम भी किए जाएंगे। हार्बर्ट बांध की ओर के हिस्से को ग्रीन बेल्ट के रूप में विकसित करने की योजना है, ताकि पर्यावरण संरक्षण के साथ क्षेत्र की सुंदरता भी बढ़ाई जा सके।
राप्ती नदी के किनारे का यह क्षेत्र डूब क्षेत्र में आता है। इसी कारण परियोजना की घोषणा के समय यहां बढ़ते अतिक्रमण को देखते हुए निर्माण गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए रजिस्ट्री प्रक्रिया को कड़ा किया गया था। प्रत्यक्ष प्रतिबंध लगाने के बजाय विभिन्न विभागों की अनापत्ति (एनओसी) अनिवार्य कर दी गई, जिससे अनियोजित निर्माण पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।
अब जीडीए और सिंचाई विभाग संयुक्त रूप से इस बात पर विचार करेंगे कि बाढ़ के दौरान परियोजना को सुरक्षित रखने और जलस्तर घटने की स्थिति में विकास कार्यों को किस प्रकार संचालित किया जाए। तकनीकी सुझावों के आधार पर यदि आवश्यक हुआ तो डीपीआर में संशोधन भी किया जाएगा। इसके बाद परियोजना की फंडिंग तय कर निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।