बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने गिरफ्तारी को लेकर एक बड़ी अहम टिप्पणी की है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया है कि, वह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक 70 साल के याचिकाकर्ता की निजी आजादी के हनन के लिए उसे 25,000 रुपये का मुआवजा दे।
दरअसल, एक बुज़ुर्ग याचिकाकर्ता, जो कि एक कारोबारी हैं, उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी थी। यह मामला उनकी बहू ने दर्ज कराया था, जिसने उन पर अपनी गरिमा को ठेस पहुंचाने और अन्य अपराधों का आरोप लगाया था। उन्होंने दलील दी कि पुलिस ने अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया और पुलिस नोटिस का जवाब देने के बाद भी उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
गिरफ्तारी के पहले लिखित में दें जानकारी: हाई कोर्ट
मामले की सुनवाई करते हुए, नागपुर बेंच की जस्टिस उर्मिला जोशी फालके और जस्टिस निवेदिता मेहता ने पाया कि नोटिस में गिरफ्तारी की वजह का कहीं भी जिक्र नहीं था। कोर्ट ने यह भी पाया कि पुलिस ने गिरफ्तारी मेमोरेंडम भी नहीं दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि सात साल तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी अपने आप नहीं हो जाती, बल्कि इसके लिए तय मानदंडों का सख्ती से पालन करना जरूरी है।
बेंच ने आगे कहा, पुलिस किसी भी आरोपी को तब तक हिरासत में नहीं ले सकती, जब तक उसे गिरफ्तारी की वजह लिखित में न बता दी जाए। इसके अलावा कानून लागू करने वाली एजेंसियों की भूमिका पर कड़ी टिप्पणियां करते हुए कहा, “जब कोई पुलिस अधिकारी ही कानून का उल्लंघन करता है, तो ऐसे उल्लंघन के लिए सजा भी उसी अनुपात में कड़ी होनी चाहिए, ताकि यह एक प्रभावी रोक का काम कर सके।”