प्रार्थना सभा में कतारबद्ध खड़े सरकारी स्कूल के छोटे-छोटे बच्चे। किसी के जूते आगे से फटे रहते हैं तो किसी की चप्पल की पट्टी निकली रहती है। घर की गरीबी ने उनके पैरों से जूते छीन लिए, लेकिन पढ़ने की जिद और कुछ बनने का सपना उनसे कभी नहीं छीन सकी। दुर्ग जिले के ऐसे ही करीब 16 हजार बच्चों के लिए 30 जून का दिन किसी उत्सव से कम नहीं रहा।
जिले के 72 सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों को नए जूते वितरित करने की प्रक्रिया शुरू हुई। नए जूते पहनते ही बच्चों के चेहरों पर खिलने वाली मुस्कान बता रही है कि यह केवल एक वस्तु का वितरण नहीं, बल्कि सम्मान और अपनत्व का एहसास है।
जिन कदमों ने अभावों के बीच भी स्कूल का रास्ता नहीं छोड़ा, आज उन्हें आगे बढ़ने का नया आत्मविश्वास मिला है। यह पहल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने की। इसके लिए वे अपने वेतन और भत्तों से करीब 23 लाख रुपये खर्च करेंगे।
दरअसल, इन बच्चों में अधिकांश ऐसे परिवारों से आते हैं जिनके माता-पिता दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। कुछ खेतों और निर्माण स्थलों पर काम कर परिवार की जरूरतें पूरी करते हैं। ऐसे घरों में किताब, कापी और यूनिफार्म की व्यवस्था करना ही बड़ी चुनौती होती है।
जूते खरीदना अक्सर प्राथमिकताओं की सूची में सबसे पीछे छूट जाता है। राज्य में एक मंत्री को वेतन व भत्ते सहित 1.90 लाख रुपये मिलते है। गजेंद्र यादव के अनुसार, जूते एक दुकानदार से उधार में लिए गए हैं, जिसे मैं अपने वेतन से चुका रहा हूं।
मासूम कदमों की कहानी इस तरह बदली
कुछ समय पहले रेलवे सुरक्षा जागरूकता कार्यक्रम के दौरान स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव की नजर बच्चों के पैरों पर पड़ी। कई बच्चे फटे जूते पहने थे, जबकि कुछ चप्पलों में ही कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उन्होंने महसूस किया कि शिक्षा केवल किताबों और कक्षाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के आत्मसम्मान और आत्मविश्वास से भी जुड़ी है। अब मंत्री स्वयं स्कूल पहुंचकर बच्चों को जूते पहना रहे हैं।