वर्षा वर्मा ( समाज सेविका , लखनऊ – उत्तरप्रदेश):
श्मशान का दृश्य स्त्री को जितना निश्चेष्ट कर देता है, ठीक उतना ही स्तब्ध कर देता है पुरुष को प्रसूति कक्ष।
दोनों जगह जीवन के दो बिल्कुल अलग छोर सामने होते हैं-एक ओर किसी अपने के चले जाने का अंतिम सत्य, तो दूसरी ओर एक नए जीवन के जन्म की पहली सांस।
श्मशान में खड़ी स्त्री अक्सर उस रिश्ते, उस स्मृति और उस संसार को अपनी आंखों के सामने समाप्त होते देखती है, जिससे उसका भावनात्मक जुड़ाव बेहद गहरा होता है। चिता की लपटों के बीच केवल एक शरीर नहीं जलता, बल्कि उससे जुड़ी अनगिनत यादें, बातें और रिश्तों की गर्माहट भी जैसे राख में बदलती महसूस होती हैं।
वहीं प्रसूति कक्ष के बाहर खड़ा पुरुष भी अपने भीतर एक अलग तरह का संघर्ष महसूस करता है। जिस क्षण उसकी पत्नी प्रसव पीड़ा से गुजर रही होती है, उस पीड़ा को वह महसूस तो करना चाहता है, लेकिन महसूस कर नहीं पाता। वह पास होकर भी असहाय होता है। उसकी आंखों के सामने जीवन जन्म लेने की प्रक्रिया होती है, लेकिन उस दर्द और संघर्ष का वह केवल साक्षी बन सकता है।
यही तो प्रकृति की अद्भुत व्यवस्था है।
स्त्री श्मशान की पीड़ा को शायद उस गहराई से महसूस करती है, जिसे पुरुष शब्दों में भी नहीं समझ सकता। और पुरुष प्रसूति कक्ष की उस पीड़ा के सामने उतना ही असहाय होता है, जिसे स्त्री अपने शरीर और आत्मा से सहती है।
दोनों मजबूत हैं-अपने-अपने स्थान पर।
लेकिन जब परिस्थितियां बदल जाती हैं, तो दोनों की संवेदनशीलता उन्हें कमजोर नहीं, बल्कि इंसान बना देती है।
शायद रिश्तों की खूबसूरती इसी में है कि हम हर दर्द को खुद महसूस नहीं कर सकते, फिर भी दूसरे के दर्द को समझने की कोशिश करते हैं।
क्योंकि जिंदगी केवल उन अनुभवों का नाम नहीं जिन्हें हमने खुद जिया है।
कभी-कभी किसी अपने की आंखों में दिखाई देने वाला दर्द भी हमें भीतर तक छू जाता है।
श्मशान जीवन के अंत का साक्षी है, प्रसूति कक्ष जीवन के आरंभ का।
एक जगह विदाई है, दूसरी जगह स्वागत।
एक जगह आंसू हैं, दूसरी जगह आंसुओं के बीच मुस्कान।
और इन दोनों के बीच इंसान खड़ा है-अपनी पूरी संवेदनशीलता के साथ।