‘जांच एजेंसी की तेजी पर उठे सवाल…’, रिश्वत मामले में CBI की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी…

 सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) की तेजी से की गई जांच को लेकर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा, ‘CBI की बहुत तेज कार्रवाई से शक पैदा हो सकता है।’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘रिश्वत की शिकायत पर CBI ने जिस तेजी से कार्रवाई की और एक सरकारी कर्मचारी को पकड़ने के लिए कुछ ही घंटों में जाल बिछाया, उससे शक पैदा हो सकता है।’

सुप्रीम कोर्ट ने CBI जांच पर उठाए सवाल

जस्टिस दीपांकर दत्ता और एन के सिंह ने दो दशक पुराने मामले में CBI की जांच में खामी पाते हुए एक अधिकारी को बरी कर दिया, क्योंकि वह रिश्वत के पैसे के साथ नहीं पकड़ा गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘रिश्वत एक बिचौलिए ने ली थी और CBI यह साबित करने में नाकाम रही कि वह पैसा आरोपी के लिए था।’

क्या है मामला?

2005 के एक मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया गया था कि रेलवे सुरक्षा बल में डिविजनल सिक्योरिटी कमिश्नर के तौर पर काम कर रहे आरोपी ने ट्रांसफर और पोस्टिंग के लिए अपने नीचे काम करने वाले अधिकारियों से गैर-कानूनी तौर पर पैसे की मांग की थी।

सीबीआई ने शिकायत के तुरंत बाद ही FIR दर्ज की और कुछ ही घंटों बाद जाल बिछाकर बिचौलिए को पकड़ लिया। बिचौलिए को माफी दे दी गई, जिसने आरोप लगाया था कि उसने अधिकारी की ओर से रिश्वत ली थी।

सुप्रीम कोर्ट ने CBI को लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने कार्रवाई के दौरान कहा कि चूंकि FIR 4 अगस्त, 2005 को दोपहर 2 बजे दर्ज की गई थी और CBI ने उसी दिन जाल बिछाने का फैसला कर लिया। कोर्ट ने कहा जाल की योजना बनाने से पहले एजेंसी को शिकायत की सच्चाई की पुष्टि कर लेनी चाहिए थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘यह हैरानी की बात है कि CBI ने औपचारिक FIR दर्ज होने से पहले ही रिश्वत की शिकायत की पुष्टि करके एक संज्ञेय अपराध की जांच शुरू कर दी।’

कोर्ट ने कहा, ‘पूरा जाल दोपहर 2 बजे से शाम 4:30 बजे के बीच बिछाया गया था। हालांकि जांच एजेंसी को इतनी तेजी से जाल बिछाने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन इससे कुछ शक पैदा हो सकते हैं। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने अपील करने वाले के उठाए गए शक को नजरअंदाज कर दिया।’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘सरकारी कर्मचारी पर आपराधिक दायित्व तय करने से पहले, अभियोजन पक्ष को भरोसेमंद सबूतों से यह साबित करना होगा कि बिचौलिया आरोपी के अधिकार, निर्देश या फायदे के लिए काम कर रहा था और मांग खुद आरोपी की ओर से की गई थी। किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा पैसा लेने से अपने आप सरकारी कर्मचारी पर आपराधिक दायित्व नहीं थोपा जा सकता।’

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