कपड़े, फुटवियर, फल‑सब्ज़ी और दाल सहित विभिन्न वस्तुओं पर ईरान में जारी संघर्ष का भारत पर कितना प्रभाव पड़ेगा, इसकी पूरी जानकारी और विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है…

ईरान युद्ध के गहराने से भारतीय निर्यात पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। सैकड़ों की संख्या में पोर्ट पर कंटेनर फंसे हुए हैं और ताजा माल की डिलीवरी रुक गई है।

अरब सागर में उथल-पुथल से निर्यात की इंश्योरेंस लागत बढ़ गई है। यूरोप व अमेरिका माल भेजने के लिए अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की जगह केप ऑफ गुड होप वाले रूट का इस्तेमाल करना होगा जिससे माल पहुंचने में 20-25 अधिक दिन लगेंगे।

इससे टेक्सटाइल, फुटवियर जैसे आइटम के निर्यात पर असर पड़ सकता है। निर्यातक फिलहाल युद्ध की स्थिति का आकलन कर रहे हैं।

सिर्फ यूएई में भारत हर महीने तीन अरब डॉलर का निर्यात करता है। चालू वित्त वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 10 महीनों में यूएई में भारत ने 32 अरब डॉलर का निर्यात किया है जिनमें फल-सब्जी, चावल के अलावा कई प्रकार के खाद्य पदार्थ शामिल है।

निर्यात पर पड़ेगा असर

ईद की वजह से खाड़ी के देशों के निर्यात में अच्छी बढ़ोतरी की उम्मीद थी जिस पर पानी फिरता दिख रहा है। पश्चिम एशिया और खाड़ी के देश भारतीय चावल के बड़े आयातक है। लगभग 15 प्रतिशत प्याज क निर्यात भी पश्चिमी एशिया में होता है।

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाइजेशंस (फियो) के अध्यक्ष एस.सी. रल्हन ने बताया कि निर्यातक उन माल को लेकर ज्यादा चिंतित है जो रास्ते में है।

जो माल पोर्ट पर है, उन्हें भी वापस नहीं मंगाया जा सकता है क्योंकि एक तो ढुलाई खर्च भी लगेगा और उसे रखने के लिए जगह भी नहीं होती है। उन्होंने बताया कि अभी रमजान का महीना चल रहा है और ईद के लिए खाड़ी देश बड़ी मात्रा में भारत से खाद्य पदार्थों का आयात करते हैं जो अब प्रभावित हो सकता है।

सूत्रों का कहना है कि जवाहरलाल नेहरू पोर्ट पर फल-सब्जी जैसे जल्दी नष्ट होने वाले आइटम के 300 कंटेनर फंसे हुए हैं। बताया जा रहा है कि मुंद्रा पोर्ट पर 1000 से अधिक कंटेनर फंसे हुए हैं। निर्यातकों ने बताया कि खाद्य आइटम को अधिक दिनों तक नहीं रखा जा सकता है। अगर अगले सप्ताह-दस दिन तक युद्ध चलता रहा तो उन्हें निश्चित रूप से भारी नुकसान हो जाएगा।

दाल की कीमत भी हो सकती है प्रभावित

ऑल इंडिया दाल मिलर्स एसोसिएशन के चेयरमैन सुरेश अग्रवाल ने बताया कि युद्ध लंबा चला तो मसूर दाल की कीमत बढ़ सकती है।

उन्होंने बताया कि भारत जिंबॉब्वे, कीनिया और म्यांमार से मुख्य रूप से तुअर दाल का आयात करता है और इन देशों से श्रीलंका के रूट से माल आता है। इसलिए उसमें कोई दिक्कत नहीं है।

कनाडा से भारत मुख्य रूप मटर का आयात करता है, लेकिन उसका आयात पहले ही बहुत हो चुका है और देश में पर्याप्त स्टॉक है।

लेकिन मसूर दाल और चना का आयात भारत ऑस्ट्रेलिया से करता है जो अरब सागर के रूट से होता है। इसलिए युद्ध लंबा चला तो मसूर दाल की कीमत बढ़ सकती है।

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