‘बोगियां सेकेंड क्लास हो सकती हैं, यात्री नहीं’- रेलवे की शब्दावली पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी…

सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे दस्तावेजों में किसी यात्री को सेकंड क्लास पैसेंजर (दूसरी श्रेणी का यात्री) कहने पर नाराजगी जताई है।

अदालत ने कहा कि यह शब्दावली देश में वर्ग विभाजन के इतिहास से जुड़ी है और भारतीय संविधान की भावना के प्रतिकूल है।

कोर्ट ने सुझाव दिया कि ‘क्लास’ की संज्ञा कोच (बोगी) के साथ जोड़ी जाए, न कि यात्री के साथ। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने 19 पेज के फैसले में यह टिप्पणी की।

2015 में ट्रेन से गिरकर चंद्रकांत ठक्कर की मौत हो गई थी। उनकी पत्नी ने मुआवजे की मांग की, लेकिन रेलवे दावा अधिकरण ने टिकट न मिलने के आधार पर मुआवजा देने से इनकार कर दिया। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों फैसलों को पलटते हुए मृतक की पत्नी को 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि शव के पास टिकट न मिलना यह साबित नहीं करता कि व्यक्ति बिना टिकट यात्रा कर रहा था। यात्री को बोनाफाइड पैसेंजर माना जाना चाहिए।

यात्री भी जिम्मेदार: सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने रेलवे पर पूरी जिम्मेदारी डालने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि यात्री खुद भी अपनी सुरक्षा के लिए समान रूप से जिम्मेदार हैं। लोग जानबूझकर जोखिम उठाते हैं, ट्रेन पकड़ने के चक्कर में खतरनाक तरीके अपनाते हैं। व्यावहारिक मजबूरियां हो सकती हैं, लेकिन जीवन की सुरक्षा सबसे ऊपर होनी चाहिए।

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