IIT परिसरों में आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों पर केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) ने चिंता जताई है।
छात्रों की आत्महत्याओं के मामलों को संकट बताते हुए सीआइसी ने ऐसी आत्महत्याओं के कारणों की जांच और समाधान के लिए संस्थानों में उच्च-स्तरीय समितियां गठित करने की सिफारिश की है।
IIT मद्रास, IIT जोधपुर, IIT गोवा और IIT कानपुर में आत्महत्याओं के मामलों के पीड़ितों का विवरण सार्वजनिक करने से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) द्वारा इन्कार किए जाने के बाद दायर की गई अपीलों पर सुनवाई के दौरान सीआइसी ने यह सिफारिश की।
सीआइसी ने कहा कि मृतक छात्रों की जानकारी साझा नहीं की जा सकती, लेकिन संस्थानों को निवारक तंत्र और मानसिक स्वास्थ्य पहलों के संबंध में पारदर्शिता को मजबूत करना चाहिए।
सूचना आयुक्त सुधा रानी रेलंगी ने कहा, IIT परिसरों में प्रतिवर्ष कई आत्महत्याओं का लगातार संकट बना हुआ है, जिनमें IIT कानपुर और IIT खड़गपुर जैसे संस्थानों में आत्महत्याओं के अधिक मामले सामने आ रहे हैं। विश्वविद्यालयों को ऐसी घटनाओं के कारणों के समाधान के लिए समिति गठित करने की अत्यंत आवश्यकता है।
आयोग ने IIT से आरटीआई अधिनियम के तहत अपनी आधिकारिक वेबसाइटों पर ऐसी समितियों के गठन और कामकाज से संबंधित विवरण दर्शाने के लिए भी कहा। यह आदेश ऐसे समय में जारी किया गया है जब हाल ही में प्रकाशित राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में 2024 में आत्महत्याओं के कुल मामलों में मामूली गिरावट आई, जबकि छात्रों की आत्महत्याओं में वृद्धि जारी रही।
एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, छात्रों की आत्महत्याओं की संख्या 2023 में 13,892 से बढ़कर 2024 में 14,488 हो गई। डाटा के अनुसार हर दिन लगभग 40 छात्र आत्महत्या करते हैं, यानी लगभग हर 36 मिनट में एक छात्र मौत हो गले लगा लेता है।
सीआइसी में अपील दायर कर IIT के पूर्व छात्र धीरज कुमार सिंह ने 2005 से IIT में आत्महत्या करने वाले छात्रों, शोध कर्मियों की आयु, लिंग, जाति या श्रेणी, शैक्षणिक पाठ्यक्रम, मूल राज्य और मृत्यु के स्थान जैसे विवरण मांगे थे। उन्होंने आयोग को बताया कि वह छात्रों के पुनर्वास और मानसिक काउंसलिंग के लिए गैर सरकारी संगठन चलाते हैं और आत्महत्याओं के मूल कारणों का विश्लेषण करने और परामर्श प्रयासों को मजबूत करने के लिए जानकारी चाहते हैं।
हालांकि, IIT ने आरटीआइ अधिनियम की धारा 8(1)(जे) के तहत गोपनीयता छूट का हवाला देते हुए नाम, आयु और जाति जैसे व्यक्तिगत विवरणों की जानकारी देने से इन्कार कर दिया। आयोग ने कहा कि यह जानकारी तीसरे पक्ष के व्यक्तिगत डाटा के बराबर है और इसकी जानकारी साझा नहीं की जा सकती।