बच्चों को उसी भाषा में मिले शिक्षा जिसे वे बेहतर समझ सकें, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को दिए अहम निर्देश…

 सुप्रीम कोर्ट ने मातृभाषा में पढ़ाई के अधिकार और महत्व पर महत्वपूर्ण फैसला दिया है।

कोर्ट ने कहा है कि मात्रभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार,संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में निहित है, क्योंकि बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी में अनिवार्य रूप से सार्थक और बोधगम्य रूप से जानकारी प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल है।

कोर्ट ने कहा है कि शिक्षा ज्ञान के संचरण का प्राथमिक माध्यम होने के नाते, जहां तक संभव हो, उस भाषा में दी जानी चाहिए जिसे बच्चा अच्छी तरह समझता हो।

ये अहम आदेश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश रद कर याचिका स्वीकार कर लिया है।

मातृभाषा में स्कूली शिक्षा के महत्व पर जोर

याचिका पर बहस करते हुए वरिष्ठ वकील मनीष सिंघवी ने मातृभाषा में स्कूली शिक्षा के महत्व पर जोर डालते हुए कहा था कि राजस्थान में करोड़ों लोग राजस्थानी बोलते हैं, करोड़ों लोगो द्वारा बोली जाने वाली भाषा को शामिल न करना राज्य की सांस्कृतिक विरासत और मातृभाषा में शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है।

राजस्थानी भाषा को स्कूलों में शिक्षा के माध्यम के रूप में लागू करें- कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान को आदेश दिया है कि वह राजस्थानी भाषा को स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा के रूप में उचित दर्जा दिलाने की दिशा में काम करे और धीरे धीरे इसे स्कूलों में शिक्षा के माध्यम के रूप में लागू करें।

कोर्ट ने कहा कि राज्य, राजस्थानी भाषा को शैक्षिक उद्देश्यों के लिए एक स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता देने और उसे उचित दर्जा प्रदान करने लिए आवश्यक उपाय करेगा तथा संवैधानिक सिद्धांतों और शिक्षण-शास्त्र संबंधी आवश्यकताओं के अनुरूप, इसे शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाने की प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से सुगम बनाएगा।

शुरुआत में स्कूली शिक्षा के बुनियादी और प्रारंभिक चरणों में, और तत्पश्चात उत्तरोत्तर उच्चतर स्तरों पर करेगा। कोर्ट ने राज्य सरकार की इस दलील को नकार दिया कि स्कूलों में केवल वही भाषा पढ़ाई जा सकती है जो संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हो।

भाषा की संस्थागत या शैक्षणिक स्वीकृति को लेकर कोई सवाल ही नहीं- कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि पूरे राज्य में कुछ विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा पढ़ाई जा रही है, इसलिए इस भाषा की संस्थागत या शैक्षणिक स्वीकृति को लेकर कोई सवाल ही नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि ये आदेश देना इसलिए जरूरी हो गया क्योंकि वर्तमान में संवैधानिक महत्व के इस क्षेत्र में एक स्पष्ट शून्यता है। कोर्ट ने नीति निर्धारण के संबंध में अदालत की सीमाओं को स्वीकार किया लेकिन इस बात पर जोर दिया कि कोर्ट उन अधिकारों के हनन पर मूकदर्शक बना नहीं रह सकता जिन्हें संवैधानिक प्रविधानों, विधायी अधिनियमों और बाध्यकारी मिसालों में मान्यता प्राप्त है।

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