एआई का बड़ा खुलासा: 700 साल पुराने अभिलेख से सामने आया सच, आक्रमणकारियों ने बदली थीं सांस्कृतिक धरोहरों की लिपियां…

मुस्लिम आक्रमणकारियों ने लंबे समय तक हमारी सांस्कृतिक धरोहरों और अभिलेखों की लिपियां बदल दी थीं। फतेहाबाद के ऐतिहासिक स्तंभ का 700 साल पुराना अभिलेख एआई तकनीक से पढ़े जाने के बाद यही संकेत मिले हैं।

इस अभिलेख को पहली बार पूरी तरह पढ़ा और समझा गया है। इससे पता चलता है कि प्राचीन स्तंभ पर अलग-अलग कालखंडों में नए लेख जोड़े गए। उसके मूल स्वरूप में बदलाव कर दिए गए। अभिलेख की ड्रोन और उच्च गुणवत्ता वाले डिजिटल कैमरों से तस्वीरें ली गईं।

इन तस्वीरों को एआई आधारित पुनर्निर्माण प्रक्रिया से जोड़कर पूरा गोलाकार अभिलेख एक साथ देखा गया, जिससे धुंधले और क्षतिग्रस्त अक्षर भी स्पष्ट हो सके। तब सामने आया कि अभिलेख अरबी और फारसी दोनों भाषाओं में है। अभिलेख को अरबी और फारसी लिपि में लिप्यंतरित (दूसरी लिपि में बदलना) किया गया था।

शोध से जुड़े द मैत्रेय ट्रस्ट के संस्थापक सिद्धार्थ गौरी के अनुसार, अभिलेख में फिरोज शाह तुगलक की वंशावली के साथ-साथ इस्लाम का प्रचार मिलता है। इसमें भारत को अल-हिंद कहा गया है। अभिलेख में यमुनानगर के टोपरा कलां से दिल्ली के कोटला तक अशोक स्तंभ के स्थानांतरण का भी जिक्र है। इस शोध कार्य में डॉ. सत्यदीप नील गौरी और एनिमेटर राजकुमारी ने भी भूमिका निभाई।

फतेहाबाद स्तंभ के पुराने अभिलेख की खूबी

फतेहाबाद का ऐतिहासिक स्तंभ का अभिलेख भारत में किसी भी स्तंभ पर सबसे लंबा इस्लामी लेख माना जाता है। पुरातत्वविद् एवं इतिहासकार देवेंद्र हांडा की पुस्तक के मुताबिक, स्तंभ लगभग 2300 वर्ष पहले सम्राट अशोक ने अग्रोहा क्षेत्र में स्थापित किया था। इसका एक भाग हिसार किले की मस्जिद के पास है।

दूसरा भाग फतेहाबाद में है। फतेहाबाद में स्तंभ की ऊंचाई करीब पांच मीटर है और परिधि 1.90 मीटर। स्तंभ दो हिस्सों में है, जिसे 14वीं शताब्दी में तुगलक ने जोड़ा था। ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि 1863 में अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस स्थल का दौरा किया।

1883-84 में गेरिक ने इसका लिथोचित्र (पत्थर पर छपाई) तैयार किया था। 1894 में पाल हार्न ने हिसार के कई अभिलेख पढ़े, पर इस स्तंभ के अभिलेखों को वे भी पूरी तरह नहीं समझ सके थे।

अधिक धुंधली होने से नहीं पढ़ी जा सकी ब्रह्म लिपि

स्तंभ की सबसे ऊपरी पंक्ति ब्रह्म लिपि में लिखी गई। अधिक धुंधली होने के कारण पढ़ी नहीं जा सकी। अभिलेख का अरबी भाग नस्क लिपि में है, जिसमें थुलुथ शैली (इस्लामी सुलेख) का प्रभाव भी है।

फारसी नस्तालीक लिपि (फारसी-अरबी लिपि की प्रमुख और अत्यंत सुंदर सुलेख शैली) है। पंक्ति एक और 31 से 33 फारसी में हैं, जबकि पंक्ति दो से 29 और 34 से 35 अरबी में लिखी गई हैं। अभिलेख में भारत को अल-हिंद कहा गया है।

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