मनरेगा में बड़ा गड़बड़झाला? पलामू में महिला मेठ के नाम दर्ज हुए 924 कार्य दिवस, 3.23 लाख रुपये के भुगतान पर उठे सवाल…

पलामू जिले में मनरेगा के तहत मेठों को किए गए भुगतान की सरकारी रिपोर्ट ने योजना की पारदर्शिता, एमआईएस प्रणाली और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, एक ही वित्तीय वर्ष में एक महिला मेठ के नाम 924 कार्य दिवस दर्ज कर 3.23 लाख रुपये का भुगतान दिखाया गया है। इसके अलावा कई अन्य पंचायतों में भी 426, 480 और 486 कार्य दिवस दर्ज हैं। इन आंकड़ों ने भुगतान प्रक्रिया और रिकॉर्ड की विश्वसनीयता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

सरकारी रिपोर्ट में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

वर्ष 2020-21 से 2022-23 की सरकारी रिपोर्ट के अनुसार लेस्लीगंज प्रखंड की सांगबार पंचायत में वित्तीय वर्ष 2021-22 के दौरान एक महिला मेठ के नाम 924 कार्य दिवस दर्ज कर 3,23,941 रुपये का भुगतान दर्शाया गया है।

इसी तरह हैदरनगर प्रखंड की सदेया पंचायत में एक महिला मेठ के नाम 480 दिन, परता पंचायत में 426 दिन तथा उटारी रोड प्रखंड की जोगा पंचायत में एक महिला मेठ के नाम 486 कार्य दिवस दर्ज किए गए हैं। मनरेगा के तहत ग्रामीण परिवारों को वर्ष में अधिकतम 100 दिनों का रोजगार देने का प्रावधान है।

हालांकि मेठ कार्यस्थल के पर्यवेक्षक होते हैं और उन पर 100 दिनों की सीमा लागू नहीं होती, लेकिन एक ही वित्तीय वर्ष में 365 दिनों से कई गुना अधिक कार्य दिवस दर्ज होना सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था और कार्य निष्पादन की दृष्टि से असामान्य माना जा रहा है।

तीन वर्षों में मेठों को 3.15 करोड़ रुपये का भुगतान

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020-21 में 71.57 लाख रुपये, 2021-22 में 1.59 करोड़ रुपये तथा 2022-23 में 84.66 लाख रुपये मेठों को भुगतान किए गए। इस तरह तीन वर्षों में कुल करीब 3.15 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ।

रिपोर्ट में दारूडीह, कुंदरी, बेलासपुर, जमुआ, पतरा और कचनपुर समेत कई पंचायतों में भी बड़ी संख्या में कार्य दिवस दर्ज हैं। कई स्थानों पर भुगतान राशि तो दर्ज है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि भुगतान कितने मेठों को किया गया। कुछ मामलों में भुगतान लंबित भी दर्शाया गया है।

एमआईएस प्रणाली पर भी उठे सवाल

संबंधित प्रखंडों के कुछ बीपीओ ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर स्वीकार किया कि सामान्य परिस्थितियों में ऑनलाइन एमआईएस में एक वित्तीय वर्ष के भीतर किसी एक मेठ के नाम 400 या 900 से अधिक कार्य दिवस दर्ज होना संभव नहीं है।

अधिकारियों ने आशंका जताई कि यह वाउचर आधारित भुगतान की तकनीकी त्रुटि या अलग-अलग अवधि के भुगतान को एक साथ दर्ज किए जाने का परिणाम हो सकता है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज इन विसंगतियों ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि यह केवल तकनीकी त्रुटि है तो वर्षों तक इसका सुधार क्यों नहीं हुआ? और यदि रिकॉर्ड सही है तो फिर भुगतान प्रक्रिया की निगरानी, सत्यापन और ऑडिट की जिम्मेदारी किसकी है? इन सवालों के बीच पूरे मामले की स्वतंत्र जांच और विशेष ऑडिट की मांग तेज हो रही है।

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