बेमेतरा : बेमेतरा बना दलहन-तिलहन क्षेत्र विस्तार का मॉडल जिला…

ग्रीष्मकालीन धान का रकबा घटा, वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़े किसान

जल संरक्षण, फसल विविधीकरण और किसानों की आय वृद्धि की दिशा में बड़ी उपलब्धि

कृषि प्रधान जिला बेमेतरा ने दलहन एवं तिलहन फसलों के क्षेत्र विस्तार में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए राज्य में एक प्रेरक मॉडल के रूप में पहचान बनाई है। जिला प्रशासन, कृषि विभाग और किसानों के सामूहिक प्रयासों से ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली वैकल्पिक फसलों की ओर किसानों का रुझान तेजी से बढ़ा है। इससे न केवल जल संरक्षण को बढ़ावा मिला है, बल्कि किसानों की आय, मृदा स्वास्थ्य और टिकाऊ कृषि व्यवस्था को भी मजबूती मिली है।

कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाला जिला है बेमेतरा

बेमेतरा जिले की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी प्रत्यक्ष रूप से कृषि कार्य पर निर्भर है। जिले में खरीफ सीजन के कुल 2.25 लाख हेक्टेयर रकबे में से लगभग 2.05 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती की जाती है। जिला वृष्टिछाया क्षेत्र अंतर्गत आता है तथा यहां औसत वार्षिक वर्षा लगभग 995 मि.मी. दर्ज की जाती है। जिले में रबी फसलों का कुल रकबा लगभग 1.73 लाख हेक्टेयर है। गत वर्ष 2024-25 में लगभग 26 हजार 680 हेक्टेयर क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन धान की खेती की गई थी, जबकि उस वर्ष जिले में केवल 600 मि.मी. वर्षा हुई थी।

ग्रीष्मकालीन धान से बढ़ा रहा था जल संकट

धान की खेती में अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है। औसतन 1 किलोग्राम धान उत्पादन के लिए 2500 से 3000 लीटर तक पानी की जरूरत पड़ती है, जबकि ग्रीष्मकालीन धान के लिए लगभग 100 सेंटीमीटर पानी की आवश्यकता होती है। इसकी पूर्ति मुख्यतः भूमिगत जल स्रोतों से होती है। वृहद स्तर पर ग्रीष्मकालीन धान की खेती के कारण जिले के कई गांवों में जल संकट की स्थिति निर्मित हुई। अनेक हैंडपंप एवं ट्यूबवेल सूख गए, जिससे पेयजल व्यवस्था प्रभावित हुई और समूह जल प्रदाय योजनाओं के संचालन में भी कठिनाई आई। अत्यधिक बिजली खपत, पर्यावरणीय असंतुलन और भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी जैसी समस्याएं भी सामने आईं।

425 ग्राम पंचायतों ने लिया बड़ा निर्णय

जिले में उत्पन्न जल संकट एवं ग्रीष्मकालीन धान को हुए नुकसान को देखते हुए सभी 425 ग्राम पंचायतों ने भविष्य में ग्रीष्मकालीन धान नहीं लेने का प्रस्ताव पारित किया। किसानों ने सामूहिक रूप से कम पानी की आवश्यकता वाली वैकल्पिक फसलों को अपनाने का निर्णय लिया, जिसे जिले में एक अभिनव एवं सराहनीय पहल माना जा रहा है।

प्रशासन और कृषि विभाग ने चलाया जागरूकता अभियान

जिला प्रशासन द्वारा किसानों से अपील की गई कि वे ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर दलहन एवं तिलहन फसलों को प्राथमिकता दें। कृषि विभाग द्वारा किसानों को उन्नत बीज उपलब्ध कराने, तकनीकी प्रशिक्षण देने, खेत भ्रमण, कृषक संगोष्ठी और जागरूकता शिविर आयोजित करने जैसे प्रयास किए गए। योजनाओं की जानकारी गांव-गांव तक पहुंचाई गई। इन सतत प्रयासों का परिणाम यह रहा की किसानों का विश्वास दलहन एवं तिलहन फसलों के प्रति बढ़ा और उन्होंने बड़े पैमाने पर इन फसलों की खेती को अपनाया।

ग्रीष्मकालीन धान का रकबा घटा, दलहन-तिलहन में ऐतिहासिक वृद्धि

पिछले वर्ष जिले में जहां 26 हजार 680 हेक्टेयर क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन धान की खेती हुई थी, वहीं इस वर्ष यह घटकर लगभग 5 हजार 139 हेक्टेयर रह गई। इसके विपरीत दलहन फसलों का रकबा 70 हजार 800 हेक्टेयर से बढ़कर 83 हजार 330 हेक्टेयर तक पहुंच गया। वहीं तिलहन फसलों का क्षेत्र 820 हेक्टेयर से बढ़कर 2 हजार 582 हेक्टेयर हो गया, जो लगभग तीन गुना वृद्धि को दर्शाता है।

फसल विविधता और किसानों की आय को मिला लाभ

दलहन एवं तिलहन क्षेत्र विस्तार से किसानों की आय बढ़ने के साथ-साथ फसल विविधता को बढ़ावा मिला है। इससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार, पोषण सुरक्षा एवं टिकाऊ कृषि व्यवस्था को मजबूती मिली है। प्रशासन का मानना है कि यह मॉडल भविष्य में अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा।

अगले वर्ष वैकल्पिक फसलों को और मिलेगा बढ़ावा

जिले में वर्तमान वर्ष में लगभग 5 हजार 139 हेक्टेयर क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन धान की खेती की गई है। आगामी वर्ष से इस क्षेत्र में मक्का, गेहूं, चना, सूरजमुखी, सरसों, मसूर सहित अन्य दलहन-तिलहन एवं कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया जाएगा। कृषि विभाग द्वारा ग्राम स्तर पर व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। किसानों को प्रशिक्षण, संगोष्ठियों एवं प्रचार-प्रसार कार्यक्रमों के माध्यम से कम पानी में अधिक लाभ देने वाली फसलों की जानकारी दी जाएगी। साथ ही गुणवत्तायुक्त बीज उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाएगी।

दलहन-तिलहन खरीदी से किसानों में बढ़ा उत्साह

जिले में प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान के अंतर्गत दलहन-तिलहन फसलों की खरीदी लगातार जारी है। अब तक 54 हजार 300 क्विंटल दलहन-तिलहन का उपार्जन किया जा चुका है तथा किसानों को 14 करोड़ 58 लाख रुपए का भुगतान भी किया गया है।किसानों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए आगामी वर्ष उपार्जन केंद्रों की संख्या बढ़ाने की तैयारी की जा रही है। बेहतर खरीदी व्यवस्था एवं समय पर भुगतान से किसानों में दलहन-तिलहन फसलों के प्रति उत्साह बढ़ा है और अगले वर्ष इसके क्षेत्र विस्तार की व्यापक संभावना जताई जा रही है।

जल संरक्षण और समृद्ध कृषि व्यवस्था की दिशा में मजबूत कदम

जिला प्रशासन ने किसानों से अपील की है कि वे जल संरक्षण, कम लागत एवं अधिक लाभकारी खेती को ध्यान में रखते हुए ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर वैकल्पिक फसलों को अपनाएं। बेमेतरा जिले की यह पहल टिकाऊ कृषि विकास और आत्मनिर्भर खेती की दिशा में एक मजबूत कदम मानी जा रही है।

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