भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास के शोधकर्ताओं ने ऐसी रसायन-मुक्त जीवाणुरोधी सतह का पेटेंट कराया है, जो हानिकारक रसायन के इस्तेमाल के बिना जीवाणुओं को खत्म कर सकती है। इसका उद्देश्य दुनियाभर में उभर रही एक गंभीर समस्या यानी रोगाणुरोधी प्रतिरोध या एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर) से निपटना है।
एएमआर वह स्थिति है, जिसमें बीमारी फैलाने वाले जीवाणु सुपरबग में बदल जाते हैं और पारंपरिक उपचारों के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं। एएमआर दुनियाभर में स्वास्थ्य क्षेत्र की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है।
प्रोफेसर परशुरामन स्वामीनाथन के अनुसार यह तकनीक किसी रासायनिक प्रक्रिया पर आधारित नहीं है, बल्कि इसमें विशेष रूप से तैयार की गई नैनो पालिमर का इस्तेमाल किया गया है। ये नैनो संरचनाएं जीवाणु के संपर्क में आने पर उनकी कोशिका दीवार को तोड़कर उन्हें नष्ट कर देती हैं।
उन्होंने पीटीआई से कहा, ये सतह मानव कोशिकाओं के जुड़ने और बढ़ने के लिए सुरक्षित हैं, लेकिन जीवाणु पर ये गंभीर दबाव डालती हैं, जिससे उनकी कोशिका दीवार टूट जाती है और वे नष्ट हो जाते हैं। इस शोध के परिणाम पत्रिका ‘एसीएस एप्लाइड बायोमटेरियल्स’ में प्रकाशित हुए हैं।
स्वामीनाथन ने कहा, रसायनों या दवाओं के इस्तेमाल के बजाय हमने सतह को ही इस तरह तैयार किया है कि वह जीवाणु को भौतिक रूप से नष्ट कर सके। यह तरीका जीवाणु में दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने के खतरे को काफी कम करता है। शोधकर्ताओं ने रिएक्टिव आयन एचिंग (आरआइई) नाम की लो-प्रेशर प्लाज्मा प्रोसेस का इस्तेमाल कर एंटीबैक्टीरियल सतहें बनाईं।
इस प्रक्रिया से सिलिकॉन की सतह पर एक खास तरह की घनी परत बनती है। यह परत जीवाणु की कोशिकाओं तक दबाव को प्रभावी ढंग से पहुंचाने में मदद करती है, जिससे नैनो संरचनाओं की जीवाणु को नष्ट करने की क्षमता बढ़ जाती है। अनुसंधानकर्ताओं की टीम ने तीन अलग-अलग प्रकार के जीवाणुओं पर इस सतह का परीक्षण किया, जिसमें ‘ग्राम-पॉजिटिव’ और ‘ग्राम-नेगेटिव’ दोनों तरह के जीवाणु शामिल थे।
परीक्षण में पाया गया कि नैनो संरचनाओं ने जीवाणु कोशिका दीवार को तोड़कर उन्हें नष्ट करने की मजबूत क्षमता दिखाई। खास बात यह है कि नैनो-संरचना वाली सतहें बैक्टीरिया के लिए तो घातक थीं, लेकिन स्तनधारी कोशिकाओं के लिए पूरी तरह अनुकूल थीं।