जन्माष्टमी 2026: द्वारका से दक्षिण भारत तक, जानिए अलग-अलग राज्यों में कैसे मनाया जाता है श्रीकृष्ण जन्मोत्सव?…

जन्माष्टमी के अवसर पर भारत वर्ष में इसकी तैयारी कई दिन पहले से ही शुरू हो जाती है। कहीं-कहीं हजारों लोग एक लटकते हुए घड़े को फोड़ने के लिए मानव पिरामिड बनाते हैं तो कहीं पर घर के मुख्य द्वार पर भगवान श्रीकृष्ण के छोटे-छोटे पदचिह्न बनाए जाते हैं।

उडुपी में रंगारंग जुलूस कृष्ण-कन्हैया के बचपन की कहानियों को फिर से जीवंत कर देता है, जबकि केरल में इस पर्व को अष्टमी रोहिणी के रूप में मनाया जाता है। ये सभी परंपराएं एक दूसरे से देखने में काफी अलग और उत्साहपूर्ण होती है। इस साल जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी।

द्वारका में जन्माष्टमी का अलग रूप

गुजरात के द्वारका में जन्माष्टमी का रूप बेहद अलग दिखाई देता है, क्योंकि यह शहर भगवान कृष्ण के द्वारकाधीश के रूप में बीते जीवन से जुड़ा है। जन्माष्टमी पर द्वारका के मंदिरों को सजाने के साथ भक्तिमय कार्यक्रमों से वातावरण भर जाता है और भक्त आधी रात को भगवान की पूजा के लिए इक्ट्ठा होते हैं।

यहां भगवान कृष्ण को एक राजा, रक्षक और नेता के रूप में पूजा जाता है। इन्हीं वजहों से द्वारका में जन्माष्टमी का अवसर बाकि राज्यों की तुलना में अलग होता है।

महाराष्ट्र में कृष्ण जन्माष्टमी

महाराष्ट्र में दही हांडी के साथ जन्माष्टमी का उत्साह अलग ही दिखाई देता है। गोविंदा दल मानव पिरामिड बनाकर दही या अन्य प्रसाद से भरे बर्तन को तोड़ने की कोशिश करते हैं।

यह परंपरा बाल कृष्ण और उनके मित्रों की उन कहानियों का प्रतीक है जिनमें वे ऊंचे बर्तनों में रखे मक्खन और दही तक पहुंचने की कोशिश करते थे।

तमिलनाडु में कृष्ण जन्माष्टमी

तमिलनाडु में भगवान कृष्ण की जयंती अक्सर एक खूबसूरत परंपरा के साथ मनाई जाती है। घर के प्रवेश द्वार से पूजा कक्ष की तरफ जाने वाले छोटे-छोटे पदचिह्न ऐसे बनाए जाते हैं मानो बाल कृष्ण घर में पधार रहे हैं।

तमिलनाडु में यह परंपरा घर को भी उत्सव का हिस्सा बना देती है। भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के साथ-साथ कई तरह के पारंपरिक प्रसाद भी तैयार किए जाते हैं।

केरल में कृष्ण जन्माष्टमी

केरल में कृष्ण जन्माष्टमी को ‘अष्टमी रोहिणी’ के नाम से मनाया जाता है। केरल में इस त्योहार की अपनी एक अलग क्षेत्रीय पहचान है। बच्चे कृष्ण और दूसरे किरदारों में सजते हैं, जबकि पारंपरिक उत्सवों में भक्ति जुलूस और उरियाडी (मटकी फोड़ने की रस्म) शामिल होती है।

इस क्षेत्रीय परंपरा में नाम से ही अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के बीच के संबंध पता चलता है। केरल सौर-कैलेंडर के मुताबिक इस साल अष्टमी रोहिणी 4 सितंबर को मनाई जाएगी।

ओडिशा में कृष्ण जन्माष्टमी

ओडिश के पुरी जगन्नाथ में भी कृष्ण जन्माष्टमी बड़ी ही भव्यता के साथ मनाई जाती है। इस दौरान भगवान कृष्ण से जुड़े अनुष्ठान और भक्ति परंपरा को पालन किया जाता है। जन्माष्टमी के दौरान मंदिर के विशाल किचन में भगवान कृष्ण को भोग अर्पित करने के लिए 56 प्रकार के भोग तैयार किए जाते हैं।

जन्माष्टमी का सबसे खूबसूरत पहलू इसकी विविधता है। गुजरात में कृष्ण को द्वारकाधीश के रूप में याद किया जाता है, महाराष्ट्र में दही हांडी के जरिए उनके मक्खन चुराने की शरारतों का जश्न मनाया जाता है।

तमिलनाडु में छोटे-छोटे पदचिह्न बनाकर उनका स्वागत किया जाता है, जबकि केरल में अष्टमी रोहिणी मनाई जाती है। ये रीति-रिवाज देखने में भले ही एक-दूसरे से काफी अलग हो सकते हैं, लेकिन इसके पीछे का भाव एक ही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *