नेपाल में बाढ़ से तबाही: 4,000 लापता, 1,200 से ज्यादा मौतें; अपनों की तलाश में भटक रहे परिवार…

नेपाल और तिब्बत सीमा पर आए विनाशकारी सैलाब और भूस्खलन के बाद लगभग 4,000 से अधिक लोग अब भी लापता हैं, जिनकी तलाश में प्रशासन, सुरक्षा बल और उनके बेचैन परिवार भारी मलबे के बीच लगातार प्रयास कर रहे हैं।

नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) ने पूरे देश में हाहाकार मचा रखा है और अब तक इस त्रासदी में 1,200 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।

काठमांडू के सबसे बड़े त्रिभुवन अस्पताल के बाहर चारों तरफ केवल अपनों को खोने का गम और चीख-पुकार मची हुई है, जहां दीवारों और रस्सियों पर लापता लोगों की तस्वीरें लटकी हुई हैं।

बाढ़ के एक सप्ताह बाद भी स्थिति इतनी भयावह है कि डॉक्टरों के लिए शवों के फिंगरप्रिंट या पहचान चिन्ह लेना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है, जबकि अस्पताल के बाहर बैठे रिश्तेदार इस उम्मीद में पथराई आंखों से इंतजार कर रहे हैं कि उन्हें कम से कम उनके प्रियजनों के शव ही मिल जाएं।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश में अभी भी 4,000 से अधिक लोग लापता हैं और अकेले त्रिभुवन अस्पताल में ही 161 से ज्यादा शव ऐसे हैं जिनकी पहचान नहीं हो सकी है।

आमतौर पर हिंदू बहुल इस देश में शवों का अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से जलाने की परंपरा है, लेकिन संक्रमण और महामारियों को फैलने से रोकने के लिए प्रशासन द्वारा काठमांडू के उत्तर और उत्तर-पश्चिम जिलों में शवों को अस्थायी रूप से दफनाया जा रहा है।

भविष्य में डीएनए मैचिंग के बाद शवों को बाहर निकालने के लिए चितवन जैसे जिलों में कड़े वैज्ञानिक इंतजाम किए गए हैं, जहां डेढ़ मीटर गहरे गड्ढे खोदकर शवों को एक निश्चित दूरी पर विशेष नंबरों के साथ दफनाया जा रहा है ताकि भविष्य में किसी भी भ्रम से बचा जा सके।

इस बेहद दर्दनाक घड़ी में कई परिवारों ने भारी मन से अपने लापता प्रियजनों के कभी वापस न लौटने की कड़वी सच्चाई को स्वीकार कर लिया है और नुवाकोट जैसे सबसे प्रभावित जिलों में त्रिशूली नदी के किनारे कुशा (घास-फूस) के पुतले बनाकर उनका सांकेतिक अंतिम संस्कार कर उन्हें हमेशा के लिए विदाई दे रहे हैं।

इस भीषण आपदा के बीच नेपाल ने अब वैश्विक मंच पर अंतरराष्ट्रीय अमीर देशों से ‘क्लाइमेट जस्टिस’ (जलवायु न्याय) की मांग तेज कर दी है।

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने साफ शब्दों में कहा है कि उनका देश उस वैश्विक संकट (ग्लोबल वॉर्मिंग) की भारी कीमत चुका रहा है जिसे उन्होंने पैदा ही नहीं किया, क्योंकि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में नेपाल की हिस्सेदारी न के बराबर है जबकि चीन, अमेरिका और भारत जैसे बड़े देश इसके मुख्य जिम्मेदार हैं।

नेपाल सरकार के वित्त मंत्रालय ने वैश्विक साझेदारों को औपचारिक रूप से जलवायु मुआवजे का दावा पत्र भेजते हुए चेतावनी दी है कि यदि हिमालय के ग्लेशियर इसी तरह पिघलते रहे, तो पूरी दक्षिण एशियाई सभ्यता और नदियों पर निर्भर 2 अरब से अधिक लोगों का जल संकट के कारण अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

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