नेपाल की आपदा में यहां के 27 हाइड्रोपावर प्लांट प्रभावित हुए हैं, जबकि 12 पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं। इन सुरंगों में फंसे सैकड़ों कर्मचारियों और लोगों को निकालने के लिए मलबे को हटाने का जीतोड़ प्रयास जारी है।
हालांकि, चट्टान और मिट्टी के मलबे की परतों को हटाना आसान नहीं है और इनके लिए भारी मशीनों की जरूरत है।
बचाव कार्य में नेपाल की मदद कर रहे आस्ट्रेलिया के भूगर्भविज्ञानी अर्नाल्ड डिक्स ने सीएनएन को बताया कि हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों के बाहर चट्टान, मिट्टी, कीचड़ और पानी भरा हुआ है। मलबे की मोटी परत हटाकर सुरंगों तक पहुंचना बेहद मुश्किल है।
ये परियोजनाएं जमीन के काफी नीचे हैं और सतह से जोड़ने वाली सुरंगें कई किलोमीटर लंबी हैं। ऐसे में मलबा हटाकर करीब छह वर्गफुट का रास्ता बनाने के लिए भी भारी मशीनों की जरूरत पड़ रही है।
डिक्स के मुताबिक, कुछ जगहों पर करीब 100 मीटर तक खुदाई की जरूरत है, लेकिन बचाव दल अब तक केवल 10 मीटर तक ही पहुंच पाया है। इसके अलावा सुरंगों के भीतर पानी भरने का खतरा भी बना हुआ है।
अगर आपातकालीन शटडाउन सिस्टम काम नहीं करता और टरबाइन रूम में पानी भर जाता है तो अंदर फंसे लोगों के लिए डूबने का खतरा पैदा हो सकता है।
उन्होंने एक परियोजना का उदाहरण देते हुए बताया कि एक जगह सतह से नीचे करीब 250 मीटर लंबी सुरंग है, जो मलबे से पूरी तरह बंद है। खुदाई शुरू होने के बाद बचाव दल करीब 130 मीटर तक ही पहुंच पाया।
अचानक आई बाढ़ से परियोजना के ढांचे को भी नुकसान पहुंचा है, जिससे हेलीकाप्टर से बचाव अभियान चलाना भी मुश्किल हो रहा है। सड़कों और पुलों के बह जाने से मशीनों को मौके पर ला पाना भी बेहद कठिन साबित हो रहा है।
त्रिशूली-3ए परियोजना में बचाव दल ने सुरंग के भीतर एक बड़ा रास्ता बनाने में सफलता पाई। कुछ बचावकर्मी रस्सियों के सहारे अंदर भी गए और फंसे लोगों को आवाज लगाई, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।
सुरंग के भीतर आक्सीजन पहुंचाई गई और कुछ भोजन भी भेजा गया है। मलबा हटाने के लिए विशेष स्टील उपकरणों का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन मोटी और अस्थिर परत के कारण बचाव अभियान बेहद धीमा है।