ओडिशा का अनोखा गोटीपुआ नृत्य: महिलाओं के वेश में लड़के करते हैं प्रस्तुति, महारी परंपरा से जुड़ा है इतिहास…

ओडिशा के डांस सिर्फ ओडिसी नृत्य तक सीमित नहीं है। यहां का मशहूर लोक नृत्य गोटीपुआ की भी अपनी खास जगह है। ये ओडिशा की संस्कृति का अहम हिस्सा है और माना जाता है कि क्लासिकल डांस ओडिसी भी इससी से बना है। 

गोटीपुआ लोक नृत्य की खासियत है कि इसे महिलाएं नहीं करतीं, लेकिन इसकी शुरुआत देवदासी प्रथा से जुड़ी है। आइए जानें ओडिशा के लोक नृत्य गोटीपुआ की शुरुआत कैसे हुई और इस नृत्य की खासियत क्या है। 

गोटीपुआ का मतलब क्या है? 

ओड़िया भाषा में गोटी का मतलब बोता है एक या अकेला और पुआ का मतलब होता है लड़का। इस लोक नृत्य की शुरुआत में सिर्फ एक लड़का ही इस नृत्य को करता था, जिससे इसका नाम पड़ा गोटीपुआ। हालांकि, अब इस नृत्य को समूह में भी किया जाने लगा है। 

कैसे हुई इसकी शुरुआत?

माना जाता है कि गोटीपुआ नृत्य की शुरुआत 16वीं शताब्दी में भोई राजवंश के राजा रामचंद्र देव के शासनकाल में हुई थी। उस समय पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान की सेवा के लिए महारी या देवदासी परंपरा का चलन था। विदेशी आक्रमणों और सामाजिक बदलावों के साथ महारी परंपरा खत्म होने लगी। उस दौरान इस कला को जिंदा रखने के लिए अखाड़ा संस्कृति की शुरुआत हुई, जहां छोटे लड़कों को ये नृत्य सिखाया जाता था। 

वैष्णव संत श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आंदोलन से प्रेरित होकर, छोटी उम्र के लड़कों को महिलाओं के रूप में सजाकर मंदिर के सामने भगवान जगन्नाथ की आराधना के लिए गोटीपुआ नृत्य कराने की परंपरा शुरू हुई। 

क्या है इस नृत्य की खासियत?

इस नृत्य की सबसे बड़ी खासियत है कि इसे सिर्फ 14 साल या उससे कम उम्र के छोटे लड़के ही करते हैं। वे महिलाओं की तरह साड़ी, गहने और पारंपरिक शृंगार करके नृत्य करते हैं। ये लोक नृत्य बंध कला में किया जाता है, जिसमें योग की मुद्राएं और एक्रोबैटिक्स शामिल है। नर्तक अपने शरीर को लचीले तरीके से मोड़कर योग मुद्राएं और ह्यूमन पिरामिड बनाते हैं। 

गोटीपुआ के गीतों में ओड़िा कवियों, जैसे- बनमाली दास के भजन गाए जाते हैं, जो मुख्य रूप से राधा-कृष्ण के प्रेम, रासलीला और भगवान जगन्नाथ के लिए भक्ति को बयां करते हैं। इसमें पखावज, हारमोनियम और बांसुरी जैसे वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है।

कैसे किया जाता है ये नृत्य?

गोटीपुआ नृत्य सीखने के लिए छोटे लड़कों को 5-6 साल की उम्र में ही अखाड़ा भेज दिया जाता है। वहां उन्हें काफी लचीलापन बढ़ाने और शारीरिक शक्ति बढ़ाने के लिए कठिन अभ्यास करना पड़ता है। साथ ही, इन्हें शास्त्रीय संगीत भी सिखाया जाता है। सिर्फ 14-15 साल तक के लड़के ही इस नृत्य को करते हैं। 

इस नृत्य की शुरुआत भगवान जगन्नाथ और गुरुओं की वंदना से होती है। इसके बाद नर्तक ओडिसी शैली में अपने हाथों, आंथों और चेहरे के भावों के जरिए राधा-कृष्ण की कथाएं पेश करते हैं। इस नृत्य का सबसे मुश्किल हिस्सा होता है जब कई लड़के एक साथ मिलकर श्री कृष्ण के रथ, कमल के फूल या कालिया नाग दमन जैसी मुश्किल शारीरिक आकृतियां बनाते हैं। इसके लिए शरीर में काफी लचीलेपन की जरूरत होती है। इसलिए सिर्फ छोटे लड़के ही ये नृत्य करते हैं और 14-15 की उम्र तक पहुंचने पर उन्हें इस डांस से रिटायर कर दिया जाता है। 

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