नेपाल की संसद में गूंजा तीन साल की मासूम से दरिंदगी का मामला, दोषियों को फांसी देने की मांग पर छिड़ी बहस…

नेपाल के बारा जिले (बिहार के रक्सौल से करीब 25 किलोमीटर दूर) में तीन साल की एक बच्ची का दुष्कर्म और हत्या के मामले ने देश में मौत की सजा बहाल करने की मांग को फिर से तेज कर दिया है।

16 अगस्त को जीतपुर-सिमरा से लापता हुई बच्ची का शव दो दिन बाद घर के पास एक सुनसान मकान से बरामद हुआ। इस घटना के बाद सिमरा, काठमांडू और देश के अन्य हिस्सों में प्रदर्शन हुए।

पुलिस ने पड़ोस के एक 16 वर्षीय किशोर को मुख्य संदिग्ध बताया है और जांच का दायरा बढ़ाते हुए नौ लोगों को हिरासत में लिया है। परिवार द्वारा लापता होने की सूचना देने के बाद पुलिस की प्रतिक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं।

संसद में मौत की सजा की मांग

इस घटना ने संसद की कार्यवाही पर कब्जा कर लिया। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) की सांसद अफसाना बानू ने संविधान के अनुच्छेद 16(2) में संशोधन की मांग की, जो मौत की सजा पर रोक लगाता है।

उन्होंने कहा कि कोई अंतरराष्ट्रीय संधि या कानून नागरिकों की सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकता। अपराधियों के मानवाधिकार की चिंता पीड़ितों के अधिकारों और न्याय की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।

अन्य सांसदों ने भी मौजूदा कानूनी ढांचे में ऐसे जघन्य अपराधों के लिए पर्याप्त सजा न होने पर सवाल उठाए। कुछ ने तर्क दिया कि अपराधी नाबालिग होने मात्र से जघन्य अपराध की सख्त सजा से नहीं बचना चाहिए।

सरकार का रुख

कानून मंत्री सोबिता गौतम और गृह मंत्री सुदन गुरुंग ने कहा कि संविधान में संशोधन किए बिना मौत की सजा लागू नहीं की जा सकती।

गौतम ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 16(2) स्पष्ट रूप से मौत की सजा वाले किसी भी कानून पर रोक लगाता है और नेपाल अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं से भी बंधा है। नेपाल ने 1990 में मौत की सजा को समाप्त कर दिया था और 2015 के संविधान में भी इसे बरकरार रखा।

मुख्य संदिग्ध 16 वर्ष का होने के कारण मामला नेपाल के किशोर न्याय कानून के अंतर्गत आएगा। 2018 के चिल्ड्रन एक्ट के तहत 16 से 18 वर्ष से कम उम्र के अपराधी को वयस्क सजा का दो-तिहाई हिस्सा ही मिल सकता है। वयस्कों के लिए दुष्कर्म के बाद हत्या पर आजीवन कारावास अधिकतम सजा है।

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