
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने हाल ही में विवादित कुरिल द्वीप समूह के इचुरुप द्वीप का दौरा किया। रूसी मीडिया के अनुसार, इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी रूसी राष्ट्रपति ने व्यक्तिगत रूप से इन विवादित द्वीपों का दौरा किया है।
गौर करने वाली बात यह है कि पुतिन का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है, जब यूक्रेन युद्ध के चलते मॉस्को और टोक्यो के रिश्ते अपने सबसे निचले स्तर पर हैं। ऐसे में रूसी राष्ट्रपति के इस ऐतिहासिक कदम को महज एक सामान्य यात्रा नहीं बल्कि एक कड़ा भू-राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
इतिहास के पन्नों से समझिए विवाद का कारण
बता दें कि इस क्षेत्रीय विवाद की जड़ें द्वितीय विश्व युद्ध के आखिरी दिनों यानी अगस्त 1945 से जुड़ी हैं। युद्ध के अंत में सोवियत संघ ( जो कि अब रूस है) की सेना ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था। जापान इन्हें अपना क्षेत्र मानता है और इन्हें ‘उत्तरी क्षेत्र’ कहता है, हालांकि जापान में इनके नाम एतोरुफु, कुनाशिरी, शिकोता और हाबोमाई हैं।
रणनीतिक और आर्थिक महत्व समझिए
इस बात को ऐसे समझिए कि ये द्वीप रूसी सुदूर पूर्व और उत्तरी जापान के बीच स्थित हैं, जो इन्हें सामरिक रूप से बेहद खास बनाते हैं। इसके अलावा, यहां की समुद्री सीमा में मछली पकड़ने के प्रचुर साधन और सोने-चांदी जैसे खनिज भी मौजूद हैं। वर्तमान में रूसी प्रशासन के तहत इन द्वीपों पर लगभग 20000 लोग रहते हैं। वहीं, जापान का कहना है कि 1945 के कब्जे के बाद वहां रह रहे करीब 17000 जापानी नागरिकों को बेदखल कर दिया गया था।
पुतिन के दौरे पर जापान का कड़ा विरोध
ऐसे में जब रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने कुरिल द्वीप समूह के इचुरुप द्वीप का दौरा किया, तब जापान ने कड़ी आपत्ति जताई। जापानी विदेश मंत्री तोशिशिमित्सु मोतेगी ने विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि एतोरुफु सहित उत्तरी क्षेत्र इतिहास और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जापान का ही अभिन्न हिस्सा है। इस लंबे विवाद के कारण ही रूस और जापान आज तक द्वितीय विश्व युद्ध को औपचारिक रूप से समाप्त करने वाली शांति संधि पर हस्ताक्षर नहीं कर पाए हैं।
अब समझिए यूक्रेन युद्ध ने कैसे बढ़ाई दूरियां?
इस बात को ऐसे समझिए कि फरवरी 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला किए जाने के बाद से रूस और जापान के रिश्ते और ज्यादा बिगड़ गए हैं। जापान ने पश्चिमी देशों के साथ मिलकर रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए और यूक्रेन का खुलकर समर्थन किया। इसके जवाब में रूस ने जापान के साथ शांति वार्ता को निलंबित कर दिया और विवादित द्वीपों से जुड़े आर्थिक सहयोग रोक दिए। मॉस्को का आरोप है कि जापान रूस के प्रति लगातार शत्रुतापूर्ण रवैया अपना रहा है।
एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में सैन्य सरगर्मी के मायने
पुतिन का यह दौरा केवल रूस-जापान के द्विपक्षीय मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे व्यापक भू-राजनीतिक कारण भी हैं। पुतिन ने सुदूर पूर्व में रूस के पैसिफिक फ्लीट के बड़े सैन्य अभ्यासों का निरीक्षण किया। उन्होंने ‘वार्याग’ मिसाइल क्रूजर का भी जायजा लिया।
उन्होंने एशिया-प्रशांत और आर्कटिक क्षेत्रों में तनाव बढ़ने की चेतावनी दी और नाटो पर इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करने का आरोप लगाया। इसी दौरान उत्तर कोरिया द्वारा बैलिस्टिक मिसाइल दागे जाने की घटना ने क्षेत्र की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है। इसका भी कारण है कि रूस और उत्तर कोरिया के बीच हाल के दिनों में सैन्य साझेदारी काफी गहरी हुई है।
रूस का संदेश क्या?
कुल मिलाकर पुतिन का यह दौरा यह स्पष्ट संदेश देता है कि 1945 से रूस के नियंत्रण वाले इन द्वीपों पर मॉस्को अपने रुख में कोई नरमी लाने के मूड में नहीं है। ऐसे में यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि में रूस और जापान के बीच जमी बर्फ के जल्दी पिघलने के कोई आसार नहीं हैं, और यह दौरा दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक तनाव को और अधिक गहराने का काम कर रहा है।