दिवाला कार्यवाही में आरडब्ल्यूए को दखल देने का अधिकार नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करने के अपने आदेश को बरकरार रखा…

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी आवासीय परियोजना की सामान्य सुविधाओं के रखरखाव और प्रबंधन के लिए गठित होमबायर्स की मेंटेनेंस सोसायटी या रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) रियल एस्टेट डेवलपर के खिलाफ चल रही दिवाला कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

अदालत के अनुसार ऐसी संस्थाओं को इनसाल्वेंसी प्रक्रिया में पक्ष बनने का वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।

न्यायमूर्ति जेबी पार्डीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने तक्षशिला हाइट्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े मामले में इनसाल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आइबीसी), 2016 के तहत जारी कार्यवाही को बरकरार रखते हुए यह महत्वपूर्ण व्यवस्था दी।

पीठ ने कहा कि यदि कोई पक्ष आइबीसी के प्रविधानों का सहारा लेता है तो उसका मूल उद्देश्य कारपोरेट देनदार का पुनरुद्धार होना चाहिए, न कि इसे केवल बकाया वसूली के शार्टकट के रूप में इस्तेमाल किया जाए।

अदालत ने यह भी कहा कि पुनरुद्धार की मंशा न होने पर संबंधित पक्षों के लिए सरफेसी कानून सहित अन्य वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं।

सोसायटी को ‘लोकस स्टैंडी’ नहींशीर्ष अदालत ने नेशनल कंपनी ला अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें एलेग्ना को-ऑपरेटिव हाउसिंग एंड कामर्शियल सोसायटी लिमिटेड की हस्तक्षेप याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी गई थी कि उसे अपील में दखल देने का अधिकार नहीं है।

अदालत ने कहा कि आइबीसी एक स्वयंपूर्ण संहिता है, जिसमें केवल विधि द्वारा परिभाषित श्रेणियों के व्यक्तियों को ही भागीदारी का अधिकार दिया गया है। धारा 5(7) के तहत ‘वित्तीय लेनदार’ वही माना जा सकता है, जिसे वास्तविक रूप से वित्तीय ऋण देय हो।

पीठ ने स्पष्ट किया कि भले ही धारा 5(8)(एफ) के स्पष्टीकरण के तहत व्यक्तिगत अलाटी को वित्तीय लेनदार का दर्जा दिया गया हो, लेकिन यह मान्यता किसी सोसायटी या एसोसिएशन को स्वत: प्राप्त नहीं हो जाती, जब तक कि वह स्वयं ऋणदाता न हो या कानून के तहत अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में मान्य न हो।

मेंटेनेंस सोसायटी की सीमित भूमिकान्यायमूर्ति महादेवन ने कहा कि आरडब्ल्यूए या होमबायर्स सोसायटी मुख्यत: कामन एरिया के रखरखाव के लिए गठित होती हैं।

उनके पदाधिकारी बिना स्पष्ट वैधानिक अधिकार के आवंटियों की ओर से न्यायिक मंचों पर प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते।

अदालत ने आगाह किया कि यदि ऐसी संस्थाओं को हस्तक्षेप की छूट दी गई तो ‘वित्तीय लेनदार’ की परिभाषा का अनावश्यक विस्तार होगा और दिवाला प्रक्रिया में देरी व अवरोध पैदा होंगे।

आइबीसी प्रक्रिया मूलत: द्विपक्षीयपीठ ने कहा कि आइबीसी की धारा 7 के तहत प्रवेश चरण की कार्यवाही मूलत: वित्तीय लेनदार और कारपोरेट देनदार के बीच द्विपक्षीय होती है, जिसमें तृतीय पक्षों को स्वतंत्र सुनवाई का अधिकार नहीं है।

सामूहिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था केवल कॉरपोरेट इन्साल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (सीआइआरपी) के बाद अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से संभव है।

अदालत ने निष्कर्ष दिया कि एलेग्ना सोसायटी न तो वित्तीय और न ही परिचालन लेनदार है, इसलिए उसे अपील या हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं मिलता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घर खरीदारों के हितों की रक्षा का उचित मार्ग कमेटी आफ क्रेडिटर्स के साथ रचनात्मक सहयोग है, ताकि परियोजना पूरी हो सके और सामूहिक हित सुरक्षित रह सके।

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