एक और ऐतिहासिक दस्तावेज में दावा, भोजशाला को सरस्वती मंदिर बताया गया…

ऐतिहासिक भोजशाला के धार्मिक स्वरूप के निर्धारण के लिए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में नियमित सुनवाई के बीच एक और ऐतिहासिक दस्तावेज सामने आया है, जिसने इस स्थल की प्रकृति का उल्लेख है।

ब्रिटिश इतिहास लेखक की किताब में उल्लेख

ब्रिटिश काल के अधिकारी और इतिहास लेखक सीई लुआर्ड ने अपनी पुस्तक- ‘धार एंड मांडू’ (अ स्केच फॉर द साइट-सीअर) में लिखा है कि भोजशाला मूलत: हिंदू मंदिर था, जो संभवत: सरस्वती को समर्पित था।

1912 में प्रकाशित हुई थी किताब

बाद में इस मंदिर के अवशेषों का उपयोग कर मस्जिद का निर्माण किया गया। 1912 में प्रकाशित इस पुस्तक में भी भोजशाला को राजा भोज का विद्यालय बताते हुए लिखा गया है कि मौजूदा ढांचा भले मस्जिद के रूप में दिखाई देता हो, लेकिन इसकी उत्पत्ति 11वीं-12वीं सदी के हिंदू मंदिर से जुड़ी है।

लुआर्ड ने इस भवन का केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में ही उल्लेख नहीं किया है, बल्कि इसका ऐतिहासिक रूपांतरण भी किया है।

इमारत के भीतर मौजूद साक्ष्य

उन्होंने लिखा है कि राजा भोज का विद्यालय नाम प्रचलित जरूर है, लेकिन इमारत के भीतर मौजूद साक्ष्य इसके मूल स्वरूप की कहानी स्वयं बयान करते हैं।

मंदिर के अवशेषों का उपयोग करके निर्मित ढांचा उस काल के राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलावों को दर्शाता है। इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में प्रकाशित इस पुस्तक का मुद्रण स्टैंडर्ड प्रेस में विशम्भर नाथ भार्गव द्वारा किया गया।

पत्थरों में दर्ज है पढ़ाई का इतिहास-लुआर्ड के अनुसार, भोजशाला के भीतर मिले संस्कृत व्याकरण से जुड़े शिलालेख इस स्थल की विशिष्ट पहचान बनाते हैं।

पत्थरों पर उकेरी गई वर्णमाला, संज्ञा और क्रिया के रूप इस बात का संकेत देते हैं कि यहां व्यवस्थित शिक्षा दी जाती थी। दो स्तंभों पर सर्पाकार शैली में अंकित विभक्ति प्रत्यय इस स्थान को साधारण धार्मिक स्थल से अलग करते हैं और इसे विद्या और शिल्प का अनोखा संगम दर्शाते हैं।

नाट्य, साहित्य, गीत, शिल्प और परंपरा का संगम

लुआर्ड ने परमारकालीन संदर्भों का उल्लेख करते हुए बताया है कि अर्जुन वर्मा के समय के संस्कृत नाटक में इस स्थल को धारानगरी के चौरासी चौराहों का आभूषण कहा गया है।

यह उल्लेख दर्शाता है कि भोजशाला केवल पूजा का केंद्र नहीं, बल्कि उस समय के सांस्कृतिक जीवन का प्रमुख केंद्र भी थी। भवन के भीतर शिलापट्टों में मुद्रित प्राकृत और संस्कृत दोनों भाषाओं के प्रमाण मिलते हैं।

इनमें से एक को राजा भोज से जोड़ा जाता है, जो इस स्थल को परमारकालीन विद्या परंपरा से जोड़ता है। शिल्पकला की ²ष्टि से भी ये अवशेष उस युग की उत्कृष्टता को सामने लाते हैं।

ब्रिटिश इतिहासकारों की किताबों में दर्ज तथ्य स्पष्ट करते हैं कि भोजशाला मूलत: सरस्वती मंदिर और विद्या का केंद्र था। संस्कृत शिलालेख, प्राकृत लेख और परमारकालीन संदर्भ इस बात के मजबूत प्रमाण हैं। ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेज यह दिखाते हैं कि बाद में इस संरचना का स्वरूप बदला गया, जिससे मंदिर होने के पक्ष को और मजबूती मिलती है।– आशीष गोयल, याचिकाकर्ता, मंदिर पक्ष

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