चिंताजनक संकेत: मलेरिया से बचाव के प्रमुख सुरक्षा कवच पर गहराया खतरा, बढ़ सकती है संक्रमण की चुनौती…

मलेरिया – एक ऐसी बीमारी जो सालों से न जाने कितने मासूमों की जिंदगी और परिवारों की खुशियां छीनती आई है।

इस जानलेवा बीमारी के खिलाफ जंग में ‘कीटनाशक युक्त मच्छरदानियां’ (इंसेक्टिसाइड-ट्रीटेड नेट्स – आइटीएन) हमेशा से एक बेहद साधारण, सस्ता और सबसे मजबूत सुरक्षा कवच रही हैं।

लेकिन हाल ही में हुआ एक वैश्विक विश्लेषण हमें खुश होने के साथ-साथ गंभीर रूप से सचेत रहने की चेतावनी दे रहा है।

12 देशों (भारत और चीन सहित एशिया व अफ्रीका के देश) पर हुए अध्ययनों का विश्लेषण बताता है कि यह सुरक्षा कवच अब खतरे में है। मच्छरों में कीटनाशकों के प्रति बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता (रेसिस्टेंस) इस जीवन रक्षक साधन के प्रभाव को कम कर रही है।

उम्मीद की किरण :

लाखों जिंदगियों का सहारा आस्ट्रेलिया की जेम्स कुक यूनिवर्सिटी और नाइजीरिया की यूनिवर्सिटी आफ जोस के शोधकर्ता डा. गबेमिनियाई ओटोलोरिन के नेतृत्व में कुल 25 अध्ययनों की बारीकी से जांच की गई।

इसमें 19 अध्ययन मलेरिया के मामलों पर और छह अध्ययन इसके कारण होने वाली मौतों पर आधारित थे। इस विश्लेषण से यह सुखद सच सामने आया कि इन मच्छरदानियों ने मलेरिया को रोकने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।

आंकड़ों की बात करें तो (एशिया में) इन मच्छरदानियों के इस्तेमाल से मलेरिया के मामलों में 68 प्रतिशत की भारी गिरावट आई और मौतों में 18 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। (अफ्रीका में) इसने मलेरिया के मामलों को 29 से 40 प्रतिशत तक कम करने में सफलता पाई।

ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं, बल्कि उन लाखों चेहरों की मुस्कान हैं जिन्हें इस साधारण से साधन ने जीवनदान दिया है।

खतरे की घंटी:

बदल रहा है मच्छरों का व्यवहार डा. ओटोलोरिन ने कहा, “यह अध्ययन जहां यह साबित करता है कि मच्छरदानियां मलेरिया के खिलाफ हमारा सबसे अचूक हथियार हैं, वहीं यह एक चेतावनी भी है कि हम हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ सकते।”

चिंता की बात यह है कि मच्छर अब इस कीटनाशक के आदी हो चुके हैं और उन्होंने अपना व्यवहार बदल लिया है। जो हथियार एक जगह इंसानों को बचा रहा है, हो सकता है वह दूसरी जगह पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा हो।

स्थानीय कारक जैसे मच्छरों की विभिन्न प्रजातियां, कीटनाशक झेलने की उनकी ताकत और लोगों द्वारा मच्छरदानी का सही ढंग से उपयोग न करना – इसके असर को प्रभावित कर रहा है। वक्त की मांग है कि हम मलेरिया उन्मूलन के इस सफर में नए रास्ते खोजें।

शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि अब हमें ‘अगली पीढ़ी की मच्छरदानियों’ (जैसे पाइरेथ्राइड-पाइपेरोनिल ब्यूटोक्साइड नेट (पीबीओ) और डुअल-एक्टिव-इंग्रीडिएंट इंसेक्टिसाइड-ट्रीटेड नेट (आइटीएन) को अपनाना होगा। साथ ही, घरों के भीतर कीटनाशक का छिड़काव और दीवारों पर कीटनाशक की परत चढ़ाने जैसी तकनीकों को भी इसका हिस्सा बनाना होगा, ताकि इस जानलेवा बीमारी को हमेशा के लिए शिकस्त दी जा सके।

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