क्या ट्रंप कर पाएंगे संतुलन? अमेरिका-ईरान डील के बाद इजरायल की बढ़ी बेचैनी…

अमेरिका और ईरान के बीच परदे के पीछे चल रही बातचीत ने पश्चिम एशिया की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी अधिकारियों के बीच बन रही नई सहमति को लेकर इजरायल के भीतर गहरी चिंता है।

इजरायल को डर है कि इस समझौते से न सिर्फ लेबनान में ईरान का दबदबा और मजबूत होगा, बल्कि हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायल की सैन्य ताकत भी कमजोर पड़ सकती है।

 मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में कई दौर की बातचीत हुई है, जिसके बाद पिछले हफ्ते दोनों देशों ने एक ‘सहमति पत्र’ (MoU) पर दस्तखत किए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य खाड़ी क्षेत्र में चल रहे तनाव और युद्ध को रोकना है।

समझौते से नेतन्याहू क्यों परेशान?

हालांकि गौर करने वाली बात यह है कि ईरान-अमेरिका के बीच समझौते पर हो रही बातचीत को लेकर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (जिन्हें प्यार से ‘बीबी’ भी कहा जाता है) परेशान हैं। इजरायल के एक सूत्र ने साफ शब्दों में कहा कि बीबी इस बात को लेकर बेहद घबराए हुए हैं।

इजरायल को किस बात का डर?

बता दें कि इस समझौते से इजरायल की चिंता के मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं। इसमें पहला कारण हिजबुल्लाह है। इस बात को ऐसे समझिए कि इजरायल का मानना है कि ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत में लेबनान के मुद्दे को भी शामिल कर लिया है। इससे ईरान ने अपने सबसे बड़े मददगार संगठन ‘हिजबुल्लाह’ को इजरायली हमलों से एक सुरक्षा कवच दिला दिया है।

बात अब दूसरे कारण की करें तो इसमें सैन्य कार्रवाई को लेकर पाबंदी भी इजरायल के लिए मुख्य चिंता का विषय है। कारण है कि अब तक इजरायल जब चाहे लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हमले कर देता था। लेकिन नए समझौते के बाद, इजरायल को लेबनान में कोई भी एयरस्ट्राइक करने से पहले वॉशिंगटन के कड़े सवालों और जांच का सामना करना पड़ेगा।

ट्रंप बना सकते हैं इजरायल पर दवाब?

तीसरा और सबसे अहम कारण है कि  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इजरायल पर यह दबाव बना सकते हैं कि वह दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना को वापस बुलाए, जबकि इजरायल का मानना है कि हिजबुल्लाह का खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है।

पुराने और नए समझौते के बीच का अंतर भी समझिए

इजरायली अधिकारियों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच बन रहा यह नया मैकेनिज्म नवंबर 2024 में जो बाइडेन प्रशासन के कार्यकाल के दौरान हुए युद्धविराम समझौतों को गंभीर रूप से कमजोर करता है। सूत्रों का कहना है कि नए और पुराने समझौतों की रूपरेखा में जमीन-आसमान का अंतर है, जो सीधे तौर पर इजरायल के रणनीतिक हितों को प्रभावित कर रहा है।

साझेदार देशों में बड़ा बदलाव

नवंबर 2024 में हुए पुराने मैकेनिज्म के तहत इजरायल, लेबनान, अमेरिका और फ्रांस सीधे तौर पर बातचीत और निगरानी की मेज पर शामिल थे, वहीं अब इस नए अमेरिकी-ईरानी मैकेनिज्म में केवल ईरान और अमेरिका ही मुख्य भूमिका में नजर आ रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस नई व्यवस्था में इजरायल को सीधे तौर पर शामिल ही नहीं किया गया है।

बदल गया रणनीतिक फोकस

इतना ही नहीं पार्श्वभूमि में बदलाव सिर्फ देशों का नहीं, बल्कि सुरक्षा प्राथमिकताओं का भी है। पुराना मैकेनिज्म मुख्य रूप से दक्षिणी लेबनान से हिजबुल्लाह के सैन्य बुनियादी ढांचे को पूरी तरह से उखाड़ फेंकने पर केंद्रित था। इसके उलट, नया ढांचा हिजबुल्लाह को खत्म करने के बजाय केवल इजरायली सेना और हिजबुल्लाह के बीच होने वाली सीधी सैन्य झड़पों को रोकने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

इजरायल के सैन्य अधिकारों पर लगी लगाम

इसके अलावा इस समझौते से इजरायल के सैन्य अधिकारों को भी बड़ा झटका लगा है। पुराने नियमों के तहत इजरायल को लेबनान में किसी भी उभरते हुए या संभावित खतरे पर तुरंत हमला करने की पूरी आजादी हासिल थी। लेकिन नए मैकेनिज्म की शर्तों के तहत, इजरायल की यह ऑपरेशनल फ्रीडम बेहद सीमित हो जाएगी और वह केवल तब कार्रवाई कर सकेगा जब हमला बिल्कुल सिर पर हो यानी खतरा ‘तुरंत’ होने वाला हो।

बदलेगा पश्चिम एशिया में सुरक्षा का संतुलन?

तनाव को कम करने और युद्धविराम को जमीनी स्तर पर बनाए रखने के लिए एक नए ‘डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल’ का गठन किया गया है। इस सेल में लेबनान के साथ-साथ मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान और कतर को शामिल किया गया है, जो इस पूरे शांति तंत्र की निगरानी में मदद करेंगे। अधिकारियों का मानना है कि यह नया समीकरण पश्चिम एशिया में सुरक्षा के संतुलन को पूरी तरह से बदल सकता है।

पर्दे के पीछे की कैसी राजनीति?

अब इस बात को ऐसे समझिए कि इस पूरे मामले में इजरायल की घरेलू राजनीति भी जुड़ी हुई है, क्योंकि इजरायल में अक्टूबर में चुनाव होने वाले हैं। हिजबुल्लाह के खिलाफ ढिलाई नेतन्याहू की राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचा सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने अपने करीबी रणनीतिकार रॉन डर्मर को ट्रंप के करीबियों को प्रभावित करने के काम पर लगाया। इसी लॉबिंग के बाद ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ईरान को चेतावनी देते हुए एक पोस्ट भी लिखा था।

लेबनान का रुख और ट्रंप की राजनीति भी समझिए

देखा जाए तो लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन इस नए सिस्टम से खुश हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर ने खुद फोन पर उन्हें इस पूरे प्लान की जानकारी दी है। दूसरी ओर जब डोनाल्ड ट्रंप से इजरायल की इस चिंता के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा कि मैं एक प्रॉब्लम सॉल्वर हूं, मैं बहुत तेजी से समस्याओं को सुलझा लेता हूं, बीबी (नेतन्याहू) के साथ भी।

इजरायल को दिलाशा देने की कोशिश

अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों ने इजरायल को भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि चूंकि अमेरिका इस पूरे मैकेनिज्म का केंद्र है, इसलिए इजरायल के हितों को कोई नुकसान नहीं होगा। अमेरिका का कहना है कि ईरान के साथ सीधा चैनल होने से अंततः इजरायल को ही फायदा पहुंचेगा।

हालांकि, अमेरिका के भीतर ही इसका विरोध शुरू हो गया है। नेतन्याहू के कट्टर समर्थक अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने ट्रंप प्रशासन के इस कदम की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि लेबनान के लिए बनाया जा रहा यह नया सिस्टम जिसमें इजरायल ही शामिल नहीं है, मेरी नजर में एक बहुत बड़ी गलती है। एक तरफ ईरान अमेरिका से अपनी शर्तें मनवा रहा है, ऐसे में इजरायल-लेबनान के बीच किसी सफल शांति समझौते की उम्मीद करना बेमानी है।

इजरायल-लेबनान की वार्ता और नाराज नेतन्याहू 

गौरतलब है कि अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो की देखरेख में इजरायल और लेबनान के बीच अलग से बातचीत होनी है, ताकि दक्षिणी लेबनान से इजरायली सेना हट सके और वहां लेबनानी सेना की तैनाती हो। लेकिन जिस तरह से अमेरिका-ईरान की इस नई समझ ने हिजबुल्लाह को संजीवनी दी है, उसने इजरायल के सुरक्षा तंत्र में हड़कंप मचा दिया है। देखना होगा कि ‘प्रॉब्लम सॉल्वर’ ट्रंप अपने सबसे पक्के दोस्त इजरायल को कैसे संतुष्ट करते हैं।

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