कर्ज, अंदरूनी कलह और कूटनीतिक दबाव में पाकिस्तान… क्या चीन और अमेरिका के बीच साध पाएगा संतुलन?…

आर्थिक कंगाली, आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा संकट से जूझ रहा पाकिस्तान इस समय इतिहास के सबसे कठिन भू-राजनीतिक दौर से गुजर रहा है।

वैश्विक मामलों के जानकारों के अनुसार, पाकिस्तान एक तरफ जहां गहरे आर्थिक कर्ज में डूबा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ वह दो धुर विरोधी महाशक्तियों चीन और अमेरिका के बीच संतुलन साधने की खतरनाक कसरत कर रहे है।

हालिया रिपोर्टों के अनुसार, इस्लामाबाद के रणनीतिक गलियारों में अब यह बड़ा सवाल गूंज रहा है- क्या आंतरिक अव्यवस्था के बीच पाकिस्तान अपनी इस ‘बैलेंसिंग एक्ट’ (संतुलन नीति) को बरकरार रख पाएगा?

कर्ज का जाल और संप्रभुता पर संकट

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय पूरी तरह से ‘लाइफ सपोर्ट’ पर है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से मिलने वाले बेलआउट पैकेज और मित्र देशों (विशेषकर चीन, सऊदी अरब और यूएई) से मिलने वाले रोलओवर कर्ज के सहारे देश डिफ़ॉल्ट होने से बच रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारी-भरकम विदेशी कर्ज ने पाकिस्तान की विदेश नीति की स्वतंत्रता को बेहद सीमित कर दिया है, जिससे उसके राष्ट्रीय फैसले प्रभावित हो रहे हैं।

चीन बनाम अमेरिका: दो पाटों के बीच पिसा इस्लामाबाद

पाकिस्तान के सामने इस समय सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते शीत युद्ध में किसी एक का पक्ष लेने से बचना है-

चीन (सीपेक का दबाव): चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत अरबों डॉलर के निवेश के कारण इस्लामाबाद पूरी तरह बीजिंग पर निर्भर है। बीजिंग का कर्ज और राजनीतिक समर्थन पाकिस्तान के लिए बेहद जरूरी है।

अमेरिका (वित्तीय ऑक्सीजन): दूसरी ओर, वाशिंगटन के साथ संबंध सुधारना भी पाकिस्तान की मजबूरी है। IMF में अपनी बात मनवाने, वैश्विक वित्तीय मोर्चों (जैसे FATF या अन्य रेटिंग्स) पर राहत पाने और सैन्य आधुनिकीकरण के लिए उसे अमेरिका के वीटो और समर्थन की दरकार रहती है।

ग्लोबल थिंक-टैंकों का मानना है कि जैसे-जैसे वाशिंगटन और बीजिंग के बीच तनाव बढ़ रहा है, पाकिस्तान के लिए दोनों नावों पर एक साथ सवारी करना लगभग असंभव होता जा रहा है।

‘मध्यस्थ’ बनने की कूटनीतिक कोशिश

अपनी गिरती वैश्विक साख को बचाने के लिए पाकिस्तान खुद को एक ‘मध्यस्थ’ (Mediator) के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। चाहे वह पश्चिम एशिया का संकट हो या अमेरिका और क्षेत्रीय ताकतों के बीच संवाद, इस्लामाबाद अपनी रणनीतिक स्थिति का फायदा उठाकर खुद को प्रासंगिक बनाए रखना चाहता है। हालांकि, आंतरिक रूप से कमजोर देश की मध्यस्थता पर वैश्विक शक्तियां कितना भरोसा करती हैं, इस पर बड़ा सवालिया निशान है।

आंतरिक मोर्चे पर चौतरफा कलह

राजनीतिक अस्थिरता: सरकार और विपक्ष के बीच जारी खींचतान और सेना की अति-सक्रिय भूमिका ने देश में राजनीतिक अनिश्चितता पैदा कर दी है।

सुरक्षा संकट: बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में चीनी नागरिकों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर बढ़े आतंकी हमलों ने बीजिंग को नाराज किया है और पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है।

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