सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान के बीच हुआ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता केवल कागजी दस्तावेज बनकर रह गया और अपने पहले ही परीक्षण में फेल हो गया।
समझौते पर हस्ताक्षर के करीब 48 घंटे बाद ही ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के जाजान प्रांत में अरामको रिफाइनरी को निशाना बनाया।
समझौते की अहम शर्त ये है कि किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। हालांकि, हमले के बाद न तो पाकिस्तान की ओर से किसी सैन्य कार्रवाई की घोषणा हुई और न तुर्किए ने तत्काल किसी सैन्य प्रति क्रिया का संकेत दिया।
‘यरुशलम पोस्ट’ के एक विश्लेषण में इसे समझौते के लिए शुरुआती परीक्षा बताया गया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार समझौते में यह प्रविधान नहीं है कि किसी एक सदस्य पर हमला होते ही बाकी दोनों देश स्वत: सैन्य कार्रवाई शुरू कर देंगे।
‘सामूहिक रक्षा की प्रतिबद्धता, लेकिन अनिवार्य सैन्य हस्तक्षेप नहीं’
तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान ने एक साक्षात्कार में कहा था कि यदि किसी सदस्य देश पर हमला होता है तो बाकी सदस्य पहले आपस में चर्चा करेंगे।
इसके बाद हमले की प्रकृति और संभावित सहायता के स्तर का आकलन किया जाएगा। यानी समझौते में सामूहिक रक्षा की प्रतिबद्धता तो है, लेकिन तत्काल और अनिवार्य सैन्य हस्तक्षेप की कोई स्वचालित व्यवस्था नहीं है।
यही वजह है कि जाजान में हुए हूती हमले के बाद पाकिस्तान और तुर्किए की तत्काल सैन्य भागीदारी नहीं होने को समझौते की विफलता कहना जल्दबाजी होगी।
हालांकि, इस घटना ने जरूर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि गंभीर संकट की स्थिति में तीनों देश अपने रक्षा सहयोग को कितनी तेजी और किस स्तर तक सैन्य कार्रवाई में बदल सकते हैं।
सऊदी-पाक समझौते पर भी उठे थे सवाल
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच भी इसी तरह का रक्षा समझौता पिछले साल हुआ था। ईरान के साथ संघर्ष के दौरान सऊदी अरब पर हुए हमलों के बीच इस समझौते की व्यावहारिक भूमिका को लेकर भी सवाल उठे थे। पाकिस्तान की ओर से तत्काल किसी प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप का संकेत नहीं मिला था।