होर्मुज स्ट्रेट जिस पर ईरान पहले से ही अपना कब्जा बरकरार रखा हुआ है, इस पर अब ट्रंप ने पूर्ण नाकाबंदी करने की चेतावनी दी है। ऐसे में सवाल यह है कि जिस होर्मुज पर ईरान पहले से पाबंदी लगाए बैठा है, उस पर अब अमेरिका क्यों नाकेबंदी करने जा रहा है।
दरअसल, ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने के बाद बार-बार यह कह चुके हैं कि होर्मुज को बिना किसी शर्त के खोला जाना चाहिए। इसके बावजूद ईरान अपनी आदत से बाज नहीं आ रहा है और होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से अवैध टोल टैक्स वसूलने की कोशिश में है। ईरान के इन्हीं फैसलों को देखते हुए ट्रंप होर्मुज में नाकेबंदी करने का निर्देश दिए हैं।
ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी नौसेना तत्काल प्रभाव से होर्मुज स्ट्रेट में प्रवेश करने और निलने वाले सभी जहाजों की नाकाबंदी शुरू कर देगी।
अमेरिका में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल
ईरान द्वारा तेल टैंकरों के आवागमन के लिए होर्मुट स्ट्रेट को बंद करने के फैसले से मिडिल ईस्ट में कच्चे तेल पर निर्भर कुछ देशों को गंभीर आर्थिक नुकसान हुआ है, और इसके कारण अमेरिका सहित दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है। अमेरिका में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से भी अधिक हो गई है।
अवैध वसूली कर रहा ईरान
बता दें कि भौतिक रूप से होर्मुज स्ट्रेट बंद नहीं है। ईरान धीरे-धीरे कुछ टैंकरों को जाने की अनुमति दे रहा है, जिसके बदले वह 20 लाख डॉलर प्रति जहाज तक की अवैध वसूली कर रहा है। युद्ध में हुए नुकसान के बीच यह ईरान की कमाई का प्रमुख स्रोत बन गया है।
सबसे खास बात यह है कि ईरान युद्ध के दौरान भी इस क्षेत्र में अपने तेल का आवागमन जारी रखे हुए है। डेटा और विश्लेषण फर्म केप्लर के अनुसार, ईरान मार्च तक औसतन 18 लाख बैरल कच्चे तेल का निर्यात करने में कामयाब रहा। यह आंकड़ा पिछले तीन महीनों की तुलना में लगभग 1 लाख बैरल प्रति दिन से भी अधिक है।
ईरान होर्मुज का इस्तेमाल करके दोहरी कमाई कर रहा है। एक ओर जहां इधर से गुजरने वाले तेल टैंकरों से भारी वसूली कर रहा है तो दूसरी ओर प्रतिबंधों के बावजूद अपना तेल बेचकर युद्ध के लिए फंड जुटा रहा है।
क्या है ट्रंप का मकसद?
अब ट्रंप होर्मुज में नाकेबंदी कर ईरान की सरकार और सैन्य अभियानों के लिए वित्तपोषण के एक प्रमुख स्रोत को काट सकते हैं ट्रंप की इस नई धमकी के पीछे का असल मकसद ईरान की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ना और उसे युद्ध समाप्त करने के लिए मजबूर करना है, भले ही इसके लिए दुनिया भर में तेल की कीमतों में भारी उछाल का जोखिम क्यों न उठाना पड़े।