अफगानिस्तान में भूकंप इतने घातक क्यों साबित होते हैं? अब तक 900 की मौत, भारत ने फिर भेजी राहत सहायता…

1 सितंबर को अफगानिस्तान के पूर्वी हिस्से, विशेष रूप से नंगरहार और कुनार प्रांतों में 6.0 तीव्रता का भूकंप आया जिसने भारी तबाही मचाई।

तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद और विभिन्न समाचार स्रोतों के अनुसार, इस भूकंप में अब तक 900 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 2,500 से 3,500 लोग घायल हुए हैं।

इसके अलावा, हजारों घर ढह गए, कई गांव मलबे में तब्दील हो गए, और लाखों लोग बेघर हो गए। भूकंप के झटके रविवार रात 11:47 बजे (स्थानीय समय) महसूस किए गए, जब अधिकांश लोग सो रहे थे जिसके कारण हताहतों की संख्या और बढ़ गई।

भूकंप का केंद्र जलालाबाद से 27 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में, मात्र 8-10 किलोमीटर की गहराई पर था। हमेशा की तरह इस बार भी भारत ने इस आपदा में मदद का हाथ बढ़ाया है। काबुल में भारतीय मिशन ने पहले तुरंत टेंट भेजे और फिर खाद्य सामग्री भेजी है।

अफगानिस्तान के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के प्रवक्ता यूसुफ हम्माद ने ‘एसोसिएटेड प्रेस’ (एपी) को बताया, ‘‘घायलों को निकाला जा रहा है, इसलिए मृतकों के आंकड़े बदल सकते हैं।’’

उन्होंने बताया, ‘‘भूकंप के कारण कुछ इलाकों में भूस्खलन हुआ, जिससे सड़कें अवरुद्ध हो गईं, लेकिन उन्हें फिर से खोल दिया गया है और बाकी सड़कों को भी खोल दिया जाएगा ताकि उन इलाकों तक पहुंच आसान हो सके जहां पहुंचना मुश्किल था।’’

हल्के झटके भी क्यों मचाते हैं तबाही?

अफगानिस्तान में भूकंप कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में कई बड़े भूकंप आए हैं। 7 अक्टूबर 2023 को 6.3 तीव्रता का भूकंप हेरात प्रांत में आया, जिसमें 1,500-4,000 लोगों की मौत हुई। 2015 में 7.5 तीव्रता का भूकंप, जिसने भारी तबाही मचाई।

2021-2025 में इस अवधि में 30 से अधिक भूकंप आए, जिनमें 2,000 से अधिक लोग मारे गए। हिंदूकुश क्षेत्र की भूगर्भीय संवेदनशीलता और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते भूस्खलन के खतरे ने इन आपदाओं को और घातक बना दिया है।

अफगानिस्तान में 6.0 तीव्रता का भूकंप रिक्टर स्केल पर मध्यम श्रेणी में आता है, लेकिन इसके बावजूद इसने भारी नुकसान पहुंचाया। इसके कई कारण हैं, जो अफगानिस्तान की भूगर्भीय, सामाजिक, और आर्थिक स्थिति से जुड़े हैं।

भूगर्भीय स्थिति और टेक्टोनिक गतिविधियां: अफगानिस्तान हिंदूकुश पर्वत श्रृंखला के पास स्थित है, जो भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव के क्षेत्र में आता है। भारतीय प्लेट हर साल 39 मिमी की रफ्तार से यूरेशियन प्लेट की ओर बढ़ रही है, जिसके कारण इस क्षेत्र में लगातार भूकंपीय गतिविधियां होती हैं।

इस भूकंप का केंद्र मात्र 8-10 किलोमीटर की गहराई पर था, जिसे उथला भूकंप माना जाता है। उथले भूकंपों में ऊर्जा सतह पर तेजी से पहुंचती है, जिससे तबाही अधिक होती है। इसके अलावा, हिंदूकुश क्षेत्र में चमन फॉल्ट, हरि रूड फॉल्ट, और पामीर थ्रस्ट फॉल्ट जैसी सक्रिय फॉल्ट लाइनें मौजूद हैं, जो भूकंप के खतरे को और बढ़ाती हैं।

कमजोर बुनियादी ढांचा: अफगानिस्तान में अधिकांश इमारतें खासकर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में कच्ची ईंटों, मिट्टी, और लकड़ी से बनी होती हैं। ये संरचनाएं भूकंप-रोधी नहीं हैं और हल्के झटकों में भी ढह जाती हैं। शहरी क्षेत्रों में भी, जैसे जलालाबाद में, इमारतें ज्यादातर ईंट और कंक्रीट की होती हैं, लेकिन इनकी गुणवत्ता अक्सर खराब होती है। खराब निर्माण मानक और भूकंप-रोधी डिजाइनों की कमी के कारण मध्यम तीव्रता के भूकंप भी भारी नुकसान पहुंचाते हैं।

दुर्गम भौगोलिक स्थिति: कुनार और नंगरहार जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और अवरुद्ध सड़कों के कारण बचाव कार्यों में भारी कठिनाइयां आती हैं। इस भूकंप के बाद कई रास्ते भूस्खलन से बंद हो गए, जिससे राहत टीमें और भारी मशीनरी दूरस्थ गांवों तक नहीं पहुंच पाईं। हेलीकॉप्टरों की मदद से घायलों को निकाला जा रहा है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।

आर्थिक और सामाजिक संकट: अफगानिस्तान पहले से ही गरीबी, सूखा, और खाद्य संकट से जूझ रहा है। तालिबान शासन के बाद अंतरराष्ट्रीय सहायता में कमी और आर्थिक प्रतिबंधों ने देश की स्थिति को और बदतर कर दिया है। भूकंप के बाद बिजली की कमी, बंद बाजार, और अपर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं ने राहत कार्यों को जटिल बना दिया। इसके अलावा, महिलाओं और बच्चों पर इस आपदा का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है, और महामारी का खतरा भी बढ़ गया है।

तबाही का मंजर

भूकंप ने कुनार प्रांत के चौकाय, नुरगल, शिगल, और मनोगई जिलों में सबसे अधिक तबाही मचाई। कई गांव पूरी तरह मलबे में तब्दील हो गए। एक स्थानीय निवासी ने बताया, “बच्चे, बुजुर्ग, और युवा मलबे के नीचे दबे हैं।” रात के समय आए इस भूकंप ने लोगों को भागने का मौका नहीं दिया।

भारत की तत्काल मदद

भारत ने इस आपदा में तुरंत मानवीय सहायता प्रदान की, जिसे अफगानिस्तान ने सराहा है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने 1 सितंबर को अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी आमिर खान मुत्ताकी से बात की और संवेदनाएं व्यक्त कीं। भारत ने तत्काल 1,000 परिवारों के लिए टेंट और 15 टन खाद्य सामग्री काबुल और कुनार भेजी। जयशंकर ने सोशल मीडिया पर लिखा, “भारत इस मुश्किल घड़ी में अफगानिस्तान के साथ खड़ा है। मंगलवार से और राहत सामग्री भेजी जाएगी।” इसके अगले दिन भारत ने दो ट्रकों में भरकर खाद्य सामग्री भेजी जिनें चावल सहित कई चीजें थीं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शोक व्यक्त करते हुए कहा, “अफगानिस्तान में भूकंप से हुई जान-माल की हानि से अत्यंत दुखी हूं। भारत हर संभव मानवीय सहायता प्रदान करने के लिए तैयार है।” भारत की यह मदद न केवल मानवीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच विश्वास को और मजबूत करती है।

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