फ्रांस में उपद्रव क्यों भड़का? इंटरनेट पर फैल रहे झूठे दावों के जनजाल में सच्चाई दबती जा रही है…

सड़कों पर नेपोलियन की वेशभूषा में घूमते प्रदर्शनकारियों से लेकर डियोर जैसे लक्जरी फैशन स्टोर्स में लूटपाट तक, फ्रांस इस समय हाल के वर्षों के सबसे गंभीर नागरिक संकट से जूझ रहा है।

छात्रों के नेतृत्व में शुरू हुए प्रदर्शनों के हिंसक रूप लेने के बाद देश भर में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़, आगजनी और सुरक्षा बलों के साथ टकराव देखा गया है।

पेरिस से 400 किलोमीटर दूर लिमोज शहर में 140 साल पुराने ऐतिहासिक टाउन हॉल को आग के हवाले कर दिया गया। देश भर में सैकड़ों पुलिसकर्मी घायल हुए हैं और लगभग 1800 लोगों को हिरासत में लिया गया है।

उपद्रव के कारण कई इलाकों में पर्यटक आंसू गैस के बीच अपने सूटकेस लेकर भागते नजर आए। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि गणतंत्र में उपद्रव के लिए कोई जगह नहीं है और सार्वजनिक संपत्तियों पर हमला करने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

क्या है विरोध प्रदर्शनों की असली वजह?

यह आंदोलन मुख्य रूप से छात्रों द्वारा शुरू किया गया था, जो स्कूलों की खस्ताहाल इमारतों, भीड़भाड़ वाली क्लासेज, शिक्षकों की भारी कमी और तेजी से बढ़ती महंगाई के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। पेरिस के उपनगरों से शुरू हुआ यह असंतोष धीरे-धीरे मार्सिले, बोर्डो, ल्यों, नीस और स्ट्रासबर्ग जैसे बड़े शहरों में फैल गया।

देखते ही देखते इस आंदोलन में शिक्षक, अभिभावक, विश्वविद्यालय के छात्र और ट्रेड यूनियन भी शामिल हो गए। घरेलू बजट पर पड़ते दबाव और सरकारी नीतियों के प्रति उपजे गुस्से ने इस प्रदर्शन को व्यापक जन-आक्रोश में बदल दिया।

हालांकि, बुनियादी शिक्षा और रोजमर्रा की लागत को लेकर शुरू हुई यह जायज मांगें जल्द ही असामाजिक तत्वों की लूटपाट और आगजनी के साए में दबकर रह गईं।

सोशल मीडिया पर फर्जी दावों का गर्म बाजार

इस अशांति के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दक्षिणपंथी नेताओं और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने वास्तविक मुद्दों को भटकाने की कोशिश की। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप सहित कई नेताओं ने दावा किया कि फ्रांस के इन हालातों के लिए केवल इमिग्रेशन जिम्मेदार है और उन्होंने सीमाओं को तुरंत बंद करने की बात कही।

एलेक्स जोन्स और टॉमी रॉबिन्सन जैसे व्यक्तियों ने सोशल मीडिया पर पुराने और असंबंधित वीडियो पोस्ट करके इसे श्वेत-विरोधी बगावत और इस्लामी विद्रोह का नाम दिया। एक वायरल वीडियो में जलती हुई बस दिखाकर ताजा हिंसा का दावा किया गया, जबकि वह वास्तव में 2022 में दक्षिणी फ्रांस के नीम्स शहर में एक स्कूल बस में लगी आग का पुराना मामला था।

इसी तरह बिना किसी ठोस सबूत के पादरियों पर हमलों और सड़कों पर लाशें बिछी होने जैसी मनगढ़ंत बातें फैलाई गईं, जिससे प्रदर्शनों के मूल आर्थिक और सामाजिक कारणों से ध्यान भटक गया।

फ्रांस में जन-आंदोलनों की ऐतिहासिक परंपरा

फ्रांस के समाज में अपनी मांगों को मनवाने के लिए सड़कों पर उतरने और सत्ता को चुनौती देने का सदियों पुराना इतिहास रहा है। वर्ष 1358 में गरीब किसानों ने सामंतों के शोषण और भारी करों के खिलाफ जाकेरी विद्रोह किया था।

इसके बाद 1789 की विश्व प्रसिद्ध फ्रांसीसी क्रांति ने राजशाही को उखाड़ फेंका और जनता के अधिकारों की स्थापना की। आगे चलकर 1830, 1848 की क्रांतियों और 1871 के पेरिस कम्यून ने भी नागरिक अधिकारों की लड़ाई को धार दी।

आधुनिक दौर में छात्र आंदोलनकारी अक्सर मई 1968 के ऐतिहासिक छात्र विद्रोह से प्रेरणा लेते हैं, जिसने देश के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे को पूरी तरह बदल दिया था। वर्ष 2018 का येलो वेस्ट आंदोलन भी ईंधन की कीमतों और जीवन-यापन की लागत के खिलाफ आम नागरिकों का ऐसा ही एक बड़ा उभार था।

फ्रांस का इतिहास बताता है कि जब नागरिकों को लगता है कि उनकी समस्याओं को सामान्य व्यवस्था के जरिए नहीं सुलझाया जा रहा, तो वे सड़क पर उतरकर व्यवस्था को जगाना अपना सबसे बड़ा अधिकार मानते हैं।

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