डॉ. सुदीप सनातनी (नगर अध्यक्ष विश्व हिंदू परिषद दुर्ग):
रावण दहन आज दशहरा यानी विजयादशमी का सबसे पहचाना जाने वाला सार्वजनिक आयोजन है, लेकिन इसका वर्तमान “विशाल पुतला दहन” रूप इतिहास में बहुत पुराना नहीं है। उपलब्ध रिकॉर्ड और लोक-स्मृतियों के अनुसार इसकी आधुनिक शुरुआत 1948 में रांची से मानी जाती है, जबकि दिल्ली के रामलीला मैदान में यह 17 अक्टूबर 1953 से शुरू हुआ।
रावण दहन का अर्थ
रामायण परंपरा में रावण अहंकार, अत्याचार, लोभ और अधर्म का प्रतीक माना जाता है, जबकि भगवान राम धर्म, संयम और न्याय के प्रतीक हैं। इसीलिए दशहरे पर रावण के पुतले का दहन “बुराई पर अच्छाई की जीत” का सार्वजनिक प्रतीक बन गया है।
यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति, नैतिक संदेश और सांस्कृतिक उत्सव का रूप भी ले चुका है। रावण के साथ अक्सर मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले भी जलाए जाते हैं।
पहला रावण दहन: रांची, 1948
आधुनिक रूप में रावण दहन की शुरुआत सबसे पहले 1948 में रांची में हुई बताई जाती है। उस समय रांची बिहार का हिस्सा था; आज यह झारखंड की राजधानी है।
यह परंपरा भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थी परिवारों—विशेष रूप से पंजाबी बिरादरी—ने शुरू की थी। शुरुआत में यह एक छोटा सामुदायिक आयोजन था, जो धीरे-धीरे विशाल सार्वजनिक उत्सव बन गया।
रांची में पहला पुतला लगभग 12 फीट ऊंचा बनाया गया था और उसे रांची कॉलेज के पास महात्मा गांधी मार्ग स्थित डाकघर के सामने जलाया गया। बाद में 1950 से 1955 के बीच यह आयोजन खजुरिया तालाब के पास शरणार्थी शिविर क्षेत्र में होने लगा।
दिल्ली में शुरुआत: 1953
दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में पहली बार रावण दहन 17 अक्टूबर 1953 को हुआ। इस अवसर पर पुतला कागज या लकड़ी के बजाय कपड़ों से तैयार किया गया था।
दिल्ली का यह आयोजन धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर सबसे प्रसिद्ध रावण दहन बन गया। आज रामलीला मैदान देशभर में दशहरा उत्सव और रावण दहन का प्रमुख प्रतीक माना जाता है।punjabkesari+1
क्या वाल्मीकि रामायण में है?
वाल्मीकि रामायण या अन्य प्राचीन ग्रंथों में रावण के पुतले जलाने की प्रथा का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। रामायण के अनुसार रावण का वध भगवान राम द्वारा होता है और उसका अंतिम संस्कार उसके भाई विभीषण करते हैं।
अतः रावण दहन को रामायण की मूल कथा का हिस्सा नहीं, बल्कि बाद की लोक-परंपरा और आधुनिक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथा मानना अधिक उचित है। इतिहासकारों का मानना है कि बड़े पैमाने पर पुतला दहन मुख्य रूप से स्वतंत्रता के बाद लोकप्रिय हुआ।
परंपरा का प्रसार
स्वतंत्रता के बाद रावण दहन ने देशभर में तेजी से जगह बनाई। इसके पीछे कई कारण रहे:
- स्वतंत्र भारत में अत्याचार और अन्याय पर विजय का सांकेतिक उत्सव।
- रामलीला, झांकियों और सामुदायिक त्योहारों से जुड़ा लोकप्रिय माध्यम।
- बच्चों और युवाओं तक रामायण के नैतिक संदेश को पहुंचाने का सरल तरीका।
- शहरी मेलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामूहिक आयोजनों का विकास।
आज यह परंपरा देश के हजारों स्थानों पर मनाई जाती है और बांस, कपड़ा, कागज तथा आतिशबाजी से बने विशाल पुतलों के साथ आयोजित होती है।wikipedia+1
क्या आज रावण दहन की आवश्यकता है?
यह प्रश्न व्यक्तिगत विश्वास, सामाजिक संदर्भ और पर्यावरणीय जिम्मेदारी—तीनों पर निर्भर करता है। रावण दहन का मूल संदेश आज भी प्रासंगिक है: अहंकार, भ्रष्टाचार, सामाजिक अन्याय, हिंसा और नैतिक पतन को चुनौती देना। इस अर्थ में “रावण” केवल एक ऐतिहासिक-पौराणिक चरित्र नहीं, बल्कि समाज के भीतर मौजूद बुराइयों का प्रतीक है।
पक्ष: क्यों जारी रखना चाहिए
- यह बुराई पर अच्छाई की जीत का सरल, दृश्य और सामूहिक प्रतीक है।
- यह रामायण, रामलीला और भारतीय लोक-संस्कृति से जुड़ाव बनाए रखता है।
- यह पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि शक्तिशाली होकर भी अधर्म का अंत अवश्य होता है।
- यह सामुदायिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और त्योहारों की साझी स्मृति को जीवित रखता है
विरोध: क्यों बदलाव जरूरी है
- बड़े पुतलों और आतिशबाजी से वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण तथा कचरे की समस्या बढ़ती है।
- आग और भीड़ के कारण सुरक्षा जोखिम बन सकता है।
- अगर आयोजन केवल भव्यता, राजनीतिक दिखावा या मनोरंजन तक सीमित रह जाए, तो उसका मूल नैतिक संदेश कमजोर पड़ सकता है।
- कुछ स्थानों पर रावण को किसी समुदाय या व्यक्ति से जोड़कर राजनीतिक प्रतीक बनाने की प्रवृत्ति मूल भावना के विपरीत जाती है।
एक संतुलित रास्ता
रावण दहन को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसे अधिक जिम्मेदार और अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है। इसके लिए पुतलों में पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का प्रयोग, आतिशबाजी पर नियंत्रण, अग्नि सुरक्षा व्यवस्था, भीड़ प्रबंधन और “अंदर के रावण”—जैसे भ्रष्टाचार, सामाजिक अन्याय, नशा, हिंसा और भेदभाव—पर चर्चा को शामिल किया जा सकता है।
इस प्रकार रावण दहन की आवश्यकता तब तक बनी रहती है, जब तक वह केवल आग दिखाने का कार्यक्रम न रहे और समाज को आत्म-निरीक्षण तथा नैतिक जिम्मेदारी का संदेश देती रहे। रांची 1948 से शुरू हुई यह परंपरा अब भारतीय दशहरे की पहचान बन चुकी है, पर इसका सच्चा मूल्य उसके संदेश में है, केवल पुतले की ऊंचाई या आतिशबाजी में नहीं।