कार्तिक अमावस्या की दिवाली पर लक्ष्मी पूजन का रहस्य क्या है? जानिए पूरी कहानी यहां…

प्रियंका प्रसाद (ज्योतिष सलाहकार): केवल व्हाट्सएप मेसेज 94064 20131

वेदों में जिस लक्ष्मी का वर्णन किया है, वह तिजोरियों में बंद स्वर्ण-राशि नहीं है।

वह भगवान नारायण की प्रिया श्रीनिधि लक्ष्मी हैं, जो समृद्धि, शील और विवेक से संबद्ध है, बता रहे हैं दर्शनशास्त्र के विद्वान शास्त्री कोसलेन्द्रदास-दीपावली आलोक का उत्सव मात्र नहीं है, अपितु मानव की सनातन साधना का प्रतीक है।

मिट्टी के दीप से लेकर अंतर्मन के आलोक तक यह पर्व मानव-पुरुषार्थ, शील और दिव्यता का सनातन संदेश है।

जब भुवन-भास्कर अस्त हो जाते हैं, चंद्र-नक्षत्र लुप्त हो जाते हैं, तब मिट्टी, तेल और बाती से संयोगित नन्हे दीप इनके प्रतिनिधि बनकर मानव चेतना को आलोकित करते हैं। ऋषियों का उद्घोष ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ उन्हीं में प्रकट होता है। इसी से शास्त्र इन्हें ‘दीप देवता’ कहते हैं।

अंधकार सदा से मानव का प्रतिद्वंद्वी रहा है। वह जब हृदय को आच्छादित कर लेता है, तब सौम्यता, सौंदर्य और सद्गुणों की आभा लुप्त हो जाती है। पर दीप की लौ अद्भुत जिजीविषा लेकर प्रकट होती है। वह रूई की नाड़ी में तेल का प्रवाह बनाकर ज्ञान-प्रभा को मुखरित करती है।

वास्तव में दीप केवल अग्नि बिंदुु नहीं, वरन नवजात शिशु का कोमल मुख है। लक्ष्मी का वरदहस्त है और दयामय ईश्वर का वरदान है।

मुंडकोपनिषद कहता है- ‘जो कुछ भी चमकता है, वह उस परमेश्वर की आभा से अनुभासित होता है, यह संपूर्ण विश्व उसी के प्रकाश से प्रकाशित एवं भासित हो रहा है।’ उपनिषदों के इस ज्ञान का प्रायोगिक स्वरूप दीपावली है।

दीपावली का महत्व इसलिए भी है कि इसमें प्रयुक्त दीप धरती की काया से बने हैं। ये किसी दैवीय वरदान के नहीं, मानव-पुरुषार्थ के प्रस्फुटन हैं।

आचार्य कुबेरनाथ राय ने सत्य ही कहा है- दीपावली की रात्रि, मनुष्य-निर्मित प्रकाश द्वारा अंधकार-विजय की रात्रि है। मिट्टी से बने ये दीप धरती की बेटी जानकी के भ्राता हैं। जब वे प्रज्वलित होते हैं, तो तारामंडल की प्रभा भी फीकी पड़ जाती है।

कार्तिक अमावस्या की कालिमा में सिंधुजा लक्ष्मी के पूजन का रहस्य है। जिस लक्ष्मी का वर्णन वेदों ने किया है, वह तिजोरियों में बंद स्वर्ण-राशि नहीं है।

वह भगवान नारायण की प्रिया श्रीनिधि लक्ष्मी हैं, जो गो-सेवा, लहलहाते अन्न, रसपूर्ण अन्न-विहार, शीलयुक्त दांपत्य और उत्तम भाषा से संबद्ध है। लक्ष्मी का तात्पर्य धन के उपयोग से है, उसके उपभोग से नहीं।

चोरी, छल, कदाचार से अर्जित संपत्ति लक्ष्मी का वरदान कभी नहीं बन सकती। दीपावली स्मरण कराती है कि असली युद्ध बाह्य अंधकार से नहीं, बल्कि अंतर्मन में बसे तमस से है। तेरहवीं सदी में जलालुद्दीन रूमी ने कहा था- दीप भले अलग-अलग हैं, पर रोशनी सबमें एक है। दीपावली केवल घर-आंगन की सज्जा नहीं, आत्मा के आलोकन का महापर्व है।

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