1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि लाहौर की सड़कों की पहचान बदल दी गई है।
पाकिस्तान में केवल इन सड़कों की पहचान ही नहीं बदली, बल्कि यहां की सड़कों का इस्लामी तमगा हटाकर पुराने हिंदू, सिख, जैन और औपनिवेशिक नामों की चादर उढ़ा दी गई है।
पाकिस्तान में ‘इस्लामपुरा’ के आधिकारिक साइनबोर्ड पर ‘कृष्णा नगर’ लिख गया है। ‘रहमान गली’ को ‘राम गली’ कहा जाने लगा है और ‘बाबरी मस्जिद चौक’ का नाम बदलकर फिर से ‘जैन मंदिर चौक’ कर दिया गया है।
पाकिस्तान में जगहों के नाम में इतने बड़े फेर-बदल के बाद अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस्लामाबाद में आजादी के इतने साल बाद ये फैसला क्यों लिया गया। आइए इसके पीछे की वजह जानते हैं।
पाकिस्तान में क्यों बदले गए सड़कों के नाम?
पाकिस्तान में पिछले दो महीनों में करीब नौ जगहों के नाम बदले जा चुके हैं और कई अन्य जगहें भी अपनी पुरानी शान वापस पाने के लिए तैयार हैं।
लाहौर में नाम बदलने का यह अभियान पाकिस्तान की पंजाब सरकार के एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट ‘लाहौर हेरिटेज एरिया रिवाइवल’ (LHAR) का हिस्सा है।
इस प्रोजेक्ट का मकसद देश की सांस्कृतिक राजधानी को उसके बंटवारे से पहले वाली विरासत के रूप में फिर से जिंदा करना है।
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का यह एक महत्वाकांक्षी ड्रीम प्रोजेक्ट है, जिसकी लागत 50 अरब पाकिस्तानी रुपया है।
इसका मकसद दशकों की अनदेखी, बेतरतीब शहरीकरण और वैचारिक रूप से इतिहास को बदलने की कोशिशों के बाद शहर की वास्तुकला और सांस्कृतिक ताने-बाने को फिर से संवारना है।