बांग्लादेश में आम चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की ऐतिहासिक जीत के बाद अब जनमत संग्रह में मिले जनादेश को लागू करने की जिम्मेदारी सामने है।
अंतरिम सरकार ने जुलाई चार्टर के 84 बिंदुओं पर अमल के लिए आम चुनाव के साथ ही जनमत संग्रह कराने की घोषणा की थी।
‘जुलाई नेशनल चार्टर (संवैधानिक संशोधन) इंप्लिमेंटेशन आर्डर 2025’ का उद्देश्य संविधान में व्यापक सुधार कर शासन व्यवस्था को तानाशाही से मुक्त करना, लोकतंत्र को मजबूत बनाना और संस्थाओं की जवाबदेही बढ़ाना बताया गया है।
क्या है जुलाई चार्टर?
स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मतदाताओं के बहुमत ने सुधार पैकेज का समर्थन किया है। एक आकलन में करीब 73 प्रतिशत मतदाताओं के ‘हां’ कहने की बात सामने आई है, हालांकि आधिकारिक परिणाम अभी घोषित नहीं हुए हैं।
फिलहाल देश में संसदीय व्यवस्था कायम है, लेकिन जनमत संग्रह को मंजूरी मिलने पर संसद में उच्च सदन के गठन का मार्ग प्रशस्त होगा।
प्रस्ताव के तहत लगभग 100 सीटें आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से आवंटित की जा सकती हैं, जो आम चुनाव में दलों को मिले मत प्रतिशत के आधार पर तय होंगी। भविष्य में किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए दोनों सदनों की मंजूरी तथा दो-तिहाई बहुमत अनिवार्य होगा।
जरूरी होगा दोनों सदनों का दो-तिहाई बहुमत प्रस्तावित ढांचे में राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग लाने के लिए भी दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जरूरी किया गया है।
साथ ही निचले सदन में विपक्षी दल के सदस्य को उपाध्यक्ष बनाना अनिवार्य करने का प्रावधान है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी किसी भी महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संधि को लागू करने से पहले दोनों सदनों की स्वीकृति आवश्यक होगी।
यूनुस देख रहे अपना फायदा
सुधार पैकेज में केयरटेकर सरकार प्रणाली को पुन: स्थापित करने की बात भी शामिल है, जिसे पहले समाप्त कर दिया गया था।
ऐसी सरकार का गठन सत्तारूढ़ दल, मुख्य विपक्ष और दूसरे बड़े विपक्षी दल की सहमति से होगा। इस सुधार में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को भी मान्यता दी गई है। वे अपनी विरासत को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं।
हालांकि, पद छोड़ने के बाद यूनुस के राजनीति से पूरी तरह दूर जाने की संभावना है। ऐसा माना जा रहा है कि वो फिर से शिक्षा और गरीबी उन्मूलन से जुड़े कामों पर ध्यान देंगे। यूनुस पहले ही साफ कर चुके हैं कि वो सत्ता की राजनीति में लंबे समय तक बने रहने के पक्ष में नहीं हैं।
अदालतों में फंस सकता है संविधान संशोधन
कई विशेषज्ञ इस जनमत संग्रह को लेकर आशंकित हैं। उनके अनुसार कुछ प्रस्ताव मौलिक संवैधानिक सिद्धांतों को बदल सकते हैं और जनमत संग्रह के जरिए संविधान की मूल संरचना पलटने की कोशिश मानी जा रही है।
आलोचकों का तर्क है कि संविधान में जनमत संग्रह का स्पष्ट प्रविधान नहीं है, इसलिए इस प्रक्रिया की वैधता पर कानूनी चुनौती संभव है और अंतिम निर्णय अदालतों तक जा सकता है।
मीडिया रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि बहुसंख्यक आबादी ने सुधारों के पक्ष में मतदान किया है, जिससे सरकार पर इन्हें लागू करने का दबाव बढ़ेगा। हालांकि द्विसदनीय संसद की स्थापना जैसे कदमों पर संवैधानिक अनुमति को लेकर बहस तेज है।
अब तक तीन बार हो चुका है जनमत संग्रह
बांग्लादेश में इससे पहले 1977, 1985 और 1991 में तीन बार जनमत संग्रह हो चुके हैं। 1977 और 1985 के जनमत संग्रह सैन्य शासन के दौरान हुए थे,
जबकि 1991 में राष्ट्रपति प्रणाली से संसदीय लोकतंत्र में वापसी के लिए जनसमर्थन लिया गया था। पूर्व जनमत संग्रहों में 84 से 98 प्रतिशत तक समर्थन दर्ज किया गया था, जिससे यह प्रक्रिया देश की राजनीतिक दिशा तय करने का अहम माध्यम रही है।
जुलाई चार्टर की मुख्य बातें
प्रधानमंत्री की शक्तियों और कार्यकाल में सीमाएं
- प्रधानमंत्री अधिकतम 10 वर्ष (या दो कार्यकाल) तक ही पद पर रह सकेगा।
- प्रधानमंत्री एक ही समय में पार्टी और सरकार का नेतृत्व नहीं कर सकेगा।
- आपातकाल केवल प्रधानमंत्री के एकतरफा आदेश पर लागू नहीं हो सकेगा- इसके लिए कैबिनेट और विपक्षी नेता की लिखित सहमति आवश्यक होगी।
- संसदीय सुधारवर्तमान एक सदन (जातीय संसद) के बजाय दो सदनों वाली संसद का निर्माण होगा- एक निचला सदन और एक उच्च सदन, जिसमें लगभग 100 सदस्य होंगे।विवादित अनुच्छेद 70 हटाया या कमजोर किया जाएगा, ताकि सांसद अपने दल की लाइन के बिना स्वतंत्र मतदान कर सकें।
- लोकतंत्र और तानाशाही रोकथामचार्टर का मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में किसी नेता द्वारा एकतरफा सत्ता का दुरुपयोग या तानाशाही का रास्ता न खुल सके।
- यह ‘दूसरा रिपब्लिक’ बनाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित हो।