अमेरिकी कांग्रेस के नियंत्रण में बदलाव वॉशिंगटन के लिए एक अहम मोड़ है, लेकिन भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी पर इसका असर बहुत बड़ा या उथल-पुथल मचाने वाला नहीं बल्कि काफी सीमित होगा।
चूंकि अमेरिकी विदेश नीति पर राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का कार्यकारी नियंत्रण बना रहेगा, इसलिए भारत को पश्चिम एशिया के संघर्ष में किसी भी तरह की नई जटिलता से सावधान रहना होगा। यह रिश्ता दोनों प्रमुख अमेरिकी दलों के समर्थन और आम सहमति पर टिका है। इसमें चीन के आक्रामक रुख के बीच हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र में सहयोग, लोगों के बीच आपसी संपर्क और तकनीक व रक्षा क्षेत्र के संबंध शामिल हैं।
चुनाव के बाद क्या बदला?
पिछले 25 वर्षों में बनी इस गति को चुनावी चक्रों से कोई खास रुकावट नहीं पहुंची है। हालांकि, इस बुनियादी तालमेल के बावजूद दूसरे ट्रंप प्रशासन के दौरान रणनीतिक साझेदारी दशकों के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई।
इसके कई कारण थे, जैसे कि व्यापार से जुड़ी एकतरफा मांगें, रूस के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को तोड़ने से भारत का इनकार, अमेरिका की आव्रजन (इमिग्रेशन) नीतियां और पाकिस्तान के प्रति वॉशिंगटन का झुकाव देखने को मिला।
क्या है संभावना?
ईरान और यूक्रेन से जुड़े मुद्दों सहित ट्रंप के कदमों की कांग्रेस द्वारा कड़ी जांच उनकी विदेश नीति को किस हद तक सीमित कर सकती है, यह स्पष्ट नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि घरेलू विरोध के बावजूद अमेरिकी कूटनीति और सेना पर ट्रंप के व्यापक कार्यकारी अधिकारों पर कांग्रेस के इस बदलाव का कोई खास असर पड़ने की संभावना नहीं है।
खास बात यह है कि इस महीने मनीला में होने वाला आसियान शिखर सम्मेलन यह संकेत दे सकता है कि मध्यावधि चुनाव के नतीजे वैश्विक मामलों को लेकर ट्रंप के नजरिए को कैसे बदल सकते हैं। भारत के साथ-साथ जापान और ऑस्ट्रेलिया के लिए भी 16 नवंबर को आसियान सम्मेलन के दौरान होने वाला क्वाड नेताओं का शिखर सम्मेलन काफी अहम होगा।
इस सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ट्रंप के साथ द्विपक्षीय बैठक भी हो सकती है। पिछले 2 वर्षों से नेताओं के शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की बारी भारत की थी, लेकिन द्विपक्षीय व्यापार विवादों के बीच ट्रंप का नई दिल्ली आने से कतराना इस आयोजन में देरी का कारण बना। इससे कई लोगों ने यह निष्कर्ष निकाला कि राष्ट्रपति ने बीजिंग के साथ करीबी संबंध बनाने के लिए क्वाड के महत्व को कम कर दिया है।
एक स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए क्वाड को बनाए रखना भारत और जापान की विदेश नीति की एक प्रमुख प्राथमिकता है।
मनीला में होने वाला नेताओं का शिखर सम्मेलन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि यह ऐसे समय में हो रहा है जब बीजिंग के साथ फिलीपींस के समुद्री तनाव जारी हैं। साथ ही, यह सम्मेलन APEC नेताओं की बैठक के लिए ट्रंप की चीन यात्रा से कुछ दिन पहले हो रहा है।
क्वाड रक्षा सहयोग और महत्वपूर्ण व उभरती प्रौद्योगिकियों पर TRUST (जिसे पहले iCET कहा जाता था) जैसी पहल के माध्यम से रणनीतिक संबंध, दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के समर्थन के आधार पर और गहरे होते जाएंगे।
भारत को मिल सकती है राहत
अमेरिका के साथ अपने व्यापार समझौते पर बातचीत करते समय भारत श्रम और पर्यावरण मानकों से जुड़ी संभावित विधायी बाधाओं पर नजर रखेगा। डेमोक्रेटिक बहुमत ट्रंप प्रशासन के एकतरफा टैरिफ कदमों पर लगाम लगाने की कोशिश कर सकता है, जिससे भारत को कुछ राहत मिल सकती है। यह आव्रजन (इमिग्रेशन) से जुड़े कड़े कानूनों पर भी रोक लगा सकता है, जिससे उच्च-कुशल भारतीय पेशेवरों और H-1B वीजा धारकों को संभावित राहत मिल सकती है।
डेमोक्रेट्स पारंपरिक रूप से मानवाधिकारों और अन्य आंतरिक मुद्दों पर भारत को लेकर अधिक मुखर रहे हैं, यहां तक कि आलोचनात्मक भी रहे हैं लेकिन शायद ही कभी ऐसा हुआ है कि इस वजह से दोनों देशों के बीच संबंधों में कोई बड़ी रुकावट आई हो।
मिडटर्म चुनावों के नतीजों के बाद, भारत डेमोक्रेटिक पार्टी की अहम समितियों के अध्यक्षों के साथ संबंध मजबूत करके व्हाइट हाउस के साथ अपने जुड़ाव में संतुलन बनाने की कोशिश करेगा। भारतीय अधिकारियों के अनुसार, समान मूल्यों और रणनीतिक लक्ष्यों पर आधारित यह रिश्ता आगे भी बढ़ता रहेगा।