बांग्लादेश से इंसानियत को शर्मसार करने वाली एक बेहद दर्दनाक और ¨चताजनक तस्वीर सामने आई है।
मानवाधिकार संगठन ‘ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फार बांग्लादेश माइनारिटीज’ की ताजा रिपोर्ट ‘द परसक्यूशन कंटिन्यूज’ ने वहां रह रहे अल्पसंख्यक समुदायों के गहरे जख्मों को दुनिया के सामने लाकर रख दिया है।
साल 2026 के शुरुआती चार महीनों (जनवरी से अप्रैल) के भीतर ही देश के 62 जिलों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की 505 खौफनाक वारदातें दर्ज की गई हैं। यह आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि वहां डर और दहशत के साए में सांसें ली जा रही हैं।
हिंसा का तांडव और टूटती उम्मीदें यह महज आंकड़े नहीं, बल्कि बेगुनाह जिंदगियों की तबाही की दास्तां हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इस खूनी खेल में हत्या और संदिग्ध मौत के 100 मामले सामने आए हैं।
वहीं, अपनों से बिछड़ने और शारीरिक प्रताड़ना के 144 और महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के 28 घिनौने मामलों ने समाज की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है। आस्था के केंद्रों को भी नहीं बख्शा गया; आस्था को ठेस पहुंचाते हुए 95 मंदिरों पर हमले और धार्मिक ¨हसा की घटनाएं हुईं।
लोग लगा रहे इंसाफ की गुहार
इसके अलावा, 132 मामलों में लोगों के आशियाने उजाड़े गए, जमीनें छीनी गईं और लूटपाट व आगजनी की गई। इंसाफ की गुहार और सुलगते सवाल चाहे पूर्ववर्ती मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार रही हो या मौजूदा बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सरकार, अल्पसंख्यकों पर लक्षित हमलों का यह सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा।
चुनाव के दौर में भी ‘बांग्लादेश हिंदू बौद्ध क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल’ ने 133 सांप्रदायिक घटनाओं को दर्ज किया था। सबसे दुखद पहलू यह है कि जब-जब इन बेगुनाहों ने सुरक्षा की गुहार लगाई, उन्हें प्रशासन से केवल सुस्ती, कमजोर जांच और न्याय की कमी ही हाथ लगी। आज पूरी दुनिया के मानवाधिकार संगठन इस सुलगते हालात पर गहरे आक्रोश और चिंता में हैं।