पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शनिवार को ईरान और अमेरिका शांति वार्ता के लिए आमने-सामने बैठे।
अगर यह वार्ता सफल हो जाती तो ‘शांतिदूत’ के तौर पर पाकिस्तान एक अहम क्षेत्रीय खिलाड़ी के तौर पर उभरता और भारत पर उसे बढ़त मिल जाती। लेकिन 21 घंटे बाद ही उसका सपना चकनाचूर हो गया।
इसके बावजूद पाकिस्तान अपनी पीठ थपथपा रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का कहना है कि जो पक्ष 47 वर्षों तक एक-दूसरे को देखने के लिए भी तैयार नहीं थे, उन्होंने भाईचारे की भूमिका निभाने के लिए पाकिस्तानी नेतृत्व की सराहना की।
पाकिस्तान के पास क्या विकल्प?
सवाल यह है कि पाकिस्तान के पास अब क्या विकल्प हैं। जानकारों का मानना है कि उसके पास पहला विकल्प, यह है कि वह अपने रास्ते पर कायम रहे, लेकिन जोखिम कम कर दे।
यानी, कूटनीतिक बातचीत का स्तर घटाकर उसे बंद दरवाजों के पीछे होने वाली बैठकों तक सीमित कर दे। इससे बिना किसी तनाव के आम सहमति बनाने में मदद मिलेगी।
दूसरा विकल्प, उन प्रयासों की दिशा में हो सकता है जिनका मकसद युद्ध को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति में संकट और जहाजरानी में आने वाली रुकावटों से निपटना हो।
आखिरी विकल्प, असफल बातचीत पर ही फिर से जोर देना हो सकता है। इसके पीछे तर्क यह होगा कि असफलता के बावजूद पाकिस्तान ही इस संघर्ष में एकमात्र ऐसा भरोसेमंद और निष्पक्ष पक्ष बना हुआ है जो सफल शांति वार्ता की मेजबानी कर सकता है।
पाकिस्तानी नेतृत्व के मन में क्या है?
इसके संकेत इन बयानों से काफी हद तक मिल जाते हैं। पीटीआई के अनुसार, शहबाज शरीफ ने सोमवार को कहा कि दोनों पक्षों के बीच सीधी बातचीत के बाद अमेरिका और ईरान के बीच विवाद सुलझाने के पूरे प्रयास किए जा रहे हैं। युद्धविराम अभी भी जारी है।
वहीं, पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार का कहना है कि उनका देश अमेरिका व ईरान के बीच बातचीत और मेलजोल को बढ़ावा देना जारी रखेगा।
लेकिन तथ्य यह है कि अभी बातचीत का कोई दूसरा दौर निर्धारित नहीं है और अगर होता भी है, तो इसकी कोई गारंटी नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अपने बेहतरीन वार्ताकारों को फिर से बातचीत की मेज पर भेजेंगे।
न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार, यरुशलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर साइमन वोल्फगैंग फुच्स ने कहा, ”पाकिस्तान इतने कम समय में इस मुश्किल से नहीं निपट सकता, न ही वह दोनों पक्षों पर दबाव डाल सकता है।”
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोईद यूसुफ ने कहा, ”अगले चरण में ईरान को मनाने में चीन की भूमिका अहम हो सकती है।”
यह एक महत्वपूर्ण संभावना है, क्योंकि चीन का वैश्विक प्रभाव अधिक है और वह ईरान के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। इस कारण से उसे वह बढ़त हासिल है जो पाकिस्तान के पास नहीं थी।
क्या इस वार्ता में चीन भी शामिल था?
हालांकि, अफगानिस्तान की एक प्रमुख समाचार एजेंसी खामा प्रेस का कहना है कि चीन इस वार्ता में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल था।
खामा प्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस वार्ता के दौरान पाकिस्तान ने एक मध्यस्थ के रूप में कम और दो प्रमुख शक्तियों (अमेरिका और चीन) के बीच संदेशवाहक के रूप में अधिक कार्य किया।
इसका कारण बताते हुए रिपोर्ट कहती है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार की बीजिंग यात्रा के महज कुछ ही दिनों बाद चीन-पाकिस्तान के संयुक्त शांति प्रस्ताव के बिंदु उस युद्धविराम रूपरेखा में सामने आए, जिन्हें अमेरिका और ईरान दोनों ने स्वीकार किया था। ट्रंप ने भी चीन के सहयोग को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था।