अमेरिका में हजारों कुशल प्रवासी कर्मचारियों के लिए राहत की एक बड़ी खबर आई है। मैसाचुसेट्स के बोस्टन में एक फेडरल कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के H-1B वीजा फीस को बढ़ाकर 1,00,000 डॉलर करने के फैसले को गैर-कानूनी बताते हुए रद कर दिया है।
यह नया आदेश वॉशिंगटन डीसी की एक फेडरल कोर्ट के उस फैसले के उलट है, जिसमें यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स के दायर किए गए एक मामले में इस फीस को सही ठहराया गया था।
H-1B वीजा क्या है?
यूएस लेबर डिपार्टमेंट के अनुसार, H-1B प्रोग्राम उन एम्प्लॉयर्स पर लागू होता है जो खास तरह के कामों में या खास काबिलियत और हुनर वाले फैशन मॉडल के तौर पर नॉन-इमिग्रेंट विदेशी नागरिकों को काम पर रखना चाहते हैं।
खास तरह के काम (स्पेशलिटी ऑक्यूपेशन) का मतलब है ऐसा काम जिसके लिए बहुत ही खास जानकारी का इस्तेमाल करने और कम से कम बैचलर डिग्री या उसके बराबर की डिग्री हासिल करने की जरूरत होती है।
श्रम विभाग का कहना है कि H-1B नियमों का मकसद उन एम्प्लॉयर्स की मदद करना है जो अमेरिकी वर्कफोर्स से जरूरी बिनेस स्किल्स और काबिलियत नहीं पा सकते। इसके लिए ऐसे काबिल लोगों को अस्थायी तौर पर काम पर रखने की मंजूरी दी जाती है जिन्हें आम तौर पर अमेरिका में काम करने की इजाजत नहीं होती।
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, H-1B प्रोग्राम के तहत हर साल लगभग 65,000 वीजा दिए जाते हैं और इसके अलावा एडवांस्ड डिग्री वाले वर्कर्स के लिए 20,000 वीजा और दिए जाते हैं। ये वीजा तीन से छह साल के लिए मंजूर किए जाते हैं और इन्हें रिन्यू कराने की जरूरत होती है।
ट्रंप प्रशासन ने कौन सी फीस लगाई थी?
पिछले साल सितंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा के लिए आवेदन की फीस बढ़ाकर 100,000 डॉलर कर दी थी। यह बढ़ी हुई फीस उन एम्प्लॉयर्स को देनी थी जो तकनीकी रूप से कुशल विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका में काम करने के लिए स्पॉन्सर करते हैं।
ट्रंप के बढ़ोतरी की घोषणा करने से पहले जो नियोक्ता ऐसी नौकरी के लिए विदेशी कर्मचारियों को रखना चाहते थे जिनमें एडवांस्ड डिग्री और स्किल्स की जरूरत होती थी, वे आम तौर पर कई बातों के आधार पर 2,000 से 5,000 डॉलर के बीच भुगतान करते थे।
भारतीयों के लिए क्या हैं इसके मायने?
बोस्टन की फेडरल कोर्ट का फैसला अमेरिका में काम करने के इच्छुक भारतीयों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। अमेरिका में H-1B वीजा धारकों में भारतीयों की बड़ी संख्या है और फीस बढ़ाने की घोषणा के समय वे सबसे ज्यादा प्रभावित समुदायों में से एक थे।
अमेरिकी प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में H-1B वीजा धारकों में से लगभग 70 प्रतिशत भारतीय हैं और उसके बाद चीनियों का नंबर आता है। अमेरिका में भारतीयों पर ‘द अदर वन परसेंट’ नाम की स्टडी लिखने वाले रिसर्चर्स के अनुसार, यह प्रोग्राम भारतीय-अमेरिकियों के अमेरिका में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे और सबसे ज्यादा कमाने वाले ग्रुप (चाहे वे प्रवासी हों या मूल निवासी) के तौर पर उभरने की एक वजह भी है।
नए फैसले से 100,000 डॉलर की बढ़ाई गई फीस को रद कर दिया गया है, जबकि पुरानी फीस लागू रहेगी। इससे अमेरिका में काम करने के इच्छुक भारतीयों के लिए अपना सपना पूरा करना आसान हो जाएगा।
अब आगे क्या?
हालांकि इस फैसले से नियोक्ताओं और विदेशी कर्मचारियों, दोनों को ही राहत मिली है लेकिन यह राहत अस्थायी हो सकती है क्योंकि व्हाइट हाउस के एक प्रवक्ता ने संकेत दिया है कि इस आदेश को अपीलीय अदालत में चुनौती दी जाएगी।
न्यूज एजेंसी पीटीआई ने व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स के हवाले से कहा, “H-1B प्रोग्राम का दशकों से गलत इस्तेमाल हो रहा था और राष्ट्रपति ट्रंप ने आखिरकार इसे ठीक करने के लिए कदम उठाया।”
उन्होंने कहा, “वॉशिंगटन में एक फेडरल जज पहले ही लगभग ऐसे ही एक आदेश को सही ठहरा चुके हैं और प्रशासन को भरोसा है कि अपील करने पर यह आदेश पलट दिया जाएगा।”
हालांकि, रिपब्लिकन समेत कई अमेरिकी सांसदों ने इस फैसले का स्वागत किया। भारतीय प्रवासी समूह भी इस कदम से खुश थे, लेकिन वे सोच रहे थे कि क्या इससे उनके संघर्षों का अंत हो गया है।