पश्चिम एशिया में चार महीनों से ज्यादा समय से जारी भीषण संघर्ष दिन-प्रतिदिन और भयावह होता जा रहा है।
ऐसे में अब शनिवार को अमेरिकी सेना ने बताया कि जॉर्डन में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों का मुकाबला करते हुए उनके दो और सैनिक मारे गए हैं।
इसके साथ ही इस संघर्ष में अब तक जान गंवाने वाले अमेरिकी सैनिकों की कुल संख्या 16 हो गई है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, इस ताजा हमले के बाद से एक अमेरिकी सैनिक अभी भी लापता है।
बिना जमीनी जंग के भी भारी नुकसान
दिलचस्प और चिंताजनक बात यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच कोई बड़े पैमाने पर आमने-सामने की जमीनी लड़ाई नहीं हो रही है। यह पूरा युद्ध मुख्य रूप से ड्रोन, मिसाइलों और हवाई हमलों के जरिए लड़ा जा रहा है।
शांति वार्ता टूटने के बाद से पश्चिम एशिया के अलग-अलग देशों में तैनात अमेरिकी सैनिक लगातार ईरान और उसके सहयोगी गुटों के निशाने पर हैं।
अब तक कहां-कहां मारे गए अमेरिकी सैनिक?
इस संघर्ष में अमेरिकी सैनिकों की मौत अलग-अलग हादसों और हमलों में हुई है। कुवैत में 28 फरवरी युद्ध की शुरुआत में ही कुवैत के एक नागरिक बंदरगाह पर ईरान के ड्रोन हमले में 6 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे। ये सैनिक एक कंटेनर जैसी असुरक्षित इमारत में काम कर रहे थे।
सऊदी अरब में 1 को प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर हुए ईरानी हमले में घायल एक और सैनिक ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया था। मार्च के अंत में इराक में सैन्य अभियानों में मदद कर रहा एक अमेरिकी विमान (KC-135) क्रैश हो गया, जिसमें 6 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई थी।
इसके अलावा अरब सागर में एक जुलाई को अमेरिकी नौसेना का एक हेलीकॉप्टर क्रैश हुआ, जिसमें एक पायलट की मौत हो गई। हालांकि, सेना ने इसे एक इमरजेंसी लैंडिंग बताया है और कहा है कि यह दुश्मन के हमले से नहीं हुआ था और अब जॉर्डन में हुए मिसाइल और ड्रोन हमले में 2 और सैनिकों की जान चली गई है।
राष्ट्रपति ट्रंप का रुख और अन्य नुकसान
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस युद्ध को सही ठहराते हुए पहले कहा था कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए यह जंग जरूरी है। हालांकि, ताजा मौतों पर शनिवार दोपहर तक उनकी तरफ से कोई सीधा बयान नहीं आया था।
दूसरे देशों और नागरिकों को नुकसान
गौरतलब है कि यह जंग सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। ईरान का दावा है कि पिछले तीन हफ्तों में अमेरिकी हमलों में उसके 50 से ज्यादा लोग मारे गए हैं और 500 से ज्यादा घायल हुए हैं। इसके अलावा खाड़ी देशों, इजरायल और लेबनान में काम करने वाले आम नागरिक और विदेशी मजदूर भी इस युद्ध की चपेट में आ रहे हैं।