एक कोशिश ऐसी भी…

वर्षा वर्मा (समाज सेविका):

आज सेवा का एक और अवसर प्राप्त हुआ। दो लावारिस दिवंगत व्यक्तियों के अंतिम संस्कार का दायित्व निभाने का सौभाग्य मिला। जीवन की इस अंतिम यात्रा में किसी भी व्यक्ति को सम्मानपूर्वक विदाई मिलना मानवता का सबसे बड़ा धर्म है, और इसी भावना के साथ यह सेवा संपन्न की गई।

हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार को सोलहवां संस्कार माना गया है। शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कारों का वर्णन मिलता है, जिनमें अंतिम संस्कार जीवन का अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है।

परंपरागत रूप से समाज में यह मान्यता रही है कि महिलाओं का स्वभाव अधिक संवेदनशील और भावुक होता है। इसी कारण उन्हें श्मशान घाट जाने से दूर रखा जाता था। विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और लोकमान्यताओं में इसके अनेक कारण बताए गए हैं। हालांकि समय के साथ समाज में विचार और परिस्थितियां बदल रही हैं तथा इस विषय पर अलग-अलग मत भी देखने को मिलते हैं।

उपरोक्त विचार और जानकारी मैंने विभिन्न स्रोतों में पढ़ी एवं सुनी हैं। इनकी पूर्ण सत्यता अथवा असत्यता पर कोई टिप्पणी करना मेरा उद्देश्य नहीं है। मेरा मानना है कि ईश्वर जिस प्रकार की सेवा का अवसर प्रदान करते हैं, उसे अपनी निष्ठा, क्षमता और समर्पण के साथ निभाने का प्रयास करना चाहिए।

प्रभु ने जो दायित्व दिया है, उसे यथासंभव पूर्ण करने की कोशिश सदैव रहेगी। शेष सब उनकी इच्छा पर निर्भर है।

मानव सेवा ही सच्ची श्रद्धांजलि है।

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