ईरान के ‘कचरा’ शांति प्रस्ताव को ट्रंप ने किया खारिज, परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज मुद्दे पर तेहरान अड़ा…

अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ईरान के उस जवाबी प्रस्ताव को ‘पूरी तरह अस्वीकार्य’ और ‘कचरे का टुकड़ा’ बताया है, जिसे तेहरान ने युद्ध खत्म करने के लिए भेजा था।

करीब 10 दिनों तक ईरान के जवाब का इंतजार करने के बाद व्हाइट हाउस को जो प्रस्ताव मिला, उसने साफ कर दिया कि इस्लामिक रिपब्लिक खुद को कमजोर नहीं, बल्कि युद्ध में मजबूत स्थिति में मान रही है। यही वजह है कि तेहरान ने युद्ध समाप्ति के बदले ऐसी शर्तें रखीं, जिन्हें वाशिंगटन स्वीकार करने के मूड में नहीं दिख रहा।

क्या चाहता है ईरान?

हालांकि दोनों देशों ने आधिकारिक तौर पर बातचीत की पूरी शर्तें सार्वजनिक नहीं की हैं, लेकिन ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक तेहरान ने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं।

  1. युद्ध का पूरी तरह अंत
  2. होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की संप्रभुता को औपचारिक मान्यता
  3. सभी अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाना

ईरान का कहना है कि किसी भी समझौते में ऐसी गारंटी भी होनी चाहिए कि अमेरिका दोबारा युद्ध शुरू नहीं करेगा। इसके लिए तेहरान चीन को संभावित गारंटर यानी गारंटी देने वाले देश के रूप में देख रहा है।

ट्रंप क्यों भड़के?

डोनल्ड ट्रंप लंबे समय से ईरान पर सख्त रुख अपनाते रहे हैं। उनका मुख्य लक्ष्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना है। अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि ईरान कम से कम 10 साल के लिए अपना परमाणु कार्यक्रम रोक दे और लगभग 440 किलोग्राम उच्च संवर्धित यूरेनियम का भंडार अमेरिका या अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को सौंप दे।

लेकिन ईरान ने इन मांगों को शुरुआती चरण में मानने से इनकार कर दिया है। तेहरान का कहना है कि पहले युद्ध खत्म हो, प्रतिबंध हटें और आर्थिक दबाव कम किया जाए, उसके बाद परमाणु मुद्दे पर आगे बात होगी।

व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा, “उन्हें लगता है कि मैं थक जाऊंगा या दबाव में आ जाऊंगा। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं होने वाला। हमें पूरी जीत मिलेगी।”

ट्रंप ने यह भी आरोप लगाया कि ईरानी नेता बार-बार अपनी बात बदल देते हैं और समझौते के करीब पहुंचने के बाद पीछे हट जाते हैं।

ईरान खुद को विजेता क्यों दिखा रहा?

अमेरिका और इजराइल द्वारा 10 सप्ताह पहले शुरू किए गए सैन्य हमलों के बावजूद ईरान ने अपने भीतर हार की छवि बनने नहीं दी। सरकारी मीडिया लगातार यह संदेश दे रहा है कि देश ने दबाव के सामने झुकने से इनकार किया है और वह लंबी लड़ाई के लिए तैयार है।

लंदन स्थित थिंक टैंक ‘चैथम हाउस’ की मिडिल ईस्ट विशेषज्ञ सनम वकील के मुताबिक, “ट्रंप समझ नहीं पा रहे कि ईरान तुरंत समझौता क्यों नहीं कर रहा। ईरानी नेतृत्व को अमेरिका, खासकर ट्रंप पर भरोसा नहीं है।”

विशेषज्ञों का मानना है कि तेहरान पहले आर्थिक राहत चाहता है ताकि उसकी अर्थव्यवस्था और शासन व्यवस्था स्थिर हो सके। इसके बाद ही वह परमाणु मुद्दे पर रियायत देने को तैयार होगा।

चीन की एंट्री क्यों अहम?

ट्रंप के चीन दौरे से पहले ईरान ने बीजिंग को संभावित मध्यस्थ और गारंटर के तौर पर आगे बढ़ाया है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची हाल ही में चीन पहुंचे थे, जहां उन्होंने चीनी विदेश मंत्री से बातचीत की।

बीजिंग में ईरान के राजदूत अब्दोलरेजा रहमान फजली ने कहा, “फारस की खाड़ी क्षेत्र में चीन की स्थिति महत्वपूर्ण है। किसी भी समझौते के लिए बड़ी शक्तियों की गारंटी जरूरी होगी और इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक ले जाना चाहिए।”

विश्लेषकों का मानना है कि चीन की भूमिका बढ़ने से अमेरिका की रणनीतिक चिंता और बढ़ सकती है, क्योंकि बीजिंग पहले से ही पश्चिम एशिया में अपना प्रभाव मजबूत करने में जुटा है।

संघर्ष विराम पर संकट

हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच एक महीने पहले युद्धविराम हुआ था, लेकिन स्थिति अभी भी बेहद नाजुक बनी हुई है।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य में कई बार नौसैनिक झड़पें हो चुकी हैं।
  • अमेरिकी सहयोगी देशों ने ईरान पर मिसाइल और ड्रोन हमलों के आरोप लगाए हैं।
  • दोनों देशों के बीच बातचीत लगभग ठप पड़ी है।
  • ट्रंप ने खुद माना कि युद्धविराम लाइफ सपोर्ट पर है।

ईरानी सेना का सख्त संदेश

ईरान की सेना भी लगातार आक्रामक बयान दे रही है। ईरानी सैन्य प्रवक्ता इब्राहिम जोल्फाघारी ने कहा, “ईरान में कोई भी ट्रंप को खुश करने की योजना नहीं बना रहा। बातचीत केवल ईरान के अधिकारों का सम्मान करने के आधार पर होगी।”

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