दिल्ली-मुंबई पर निर्भरता होगी कम, लोहिया संस्थान में मिलेगा लिवर और बोन मैरो ट्रांसप्लांट का इलाज…

लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में अक्टूबर तक बोनमैरो और लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा शुरू करने की तैयारी अंतिम चरण में है।

संस्थान में प्रदेश का पहला अत्याधुनिक एडवांस सेंटर फार ट्रांसप्लांट बनकर तैयार हो चुका है, जहां किडनी, लिवर और बोनमैरो प्रत्यारोपण की सुविधाएं एक ही परिसर में उपलब्ध कराई जाएंगी।

दीक्षा समारोह के दौरान निदेशक प्रो. सीएम सिंह ने कहा, केंद्र के संचालन से अब प्रदेश के मरीजों को प्रत्यारोपण के लिए दिल्ली, मुंबई, चेन्नई या हैदराबाद जैसे बड़े शहरों का रुख नहीं करना पड़ेगा।

एक ही छत के नीचे मिलेंगी कई सुविधाएं

लोहिया संस्थान में तैयार किए गए एडवांस ट्रांसप्लांट सेंटर का उद्देश्य जटिल प्रत्यारोपण को प्रदेश में ही उपलब्ध कराना है। वर्तमान में संस्थान में रोबोट से किडनी प्रत्यारोपण हो रहा है, जबकि लिवर और बोनमैरो ट्रांसप्लांट सेवाओं को भी शुरू करने की तैयारी तेज कर दी गई है।

इसके शुरू होने के बाद मरीजों को जांच, आपरेशन, आइसीयू और पोस्ट-ट्रांसप्लांट फालोअप जैसी सभी सुविधाएं एक ही छत के नीचे मिलेंगी। फिलहाल, लिवर ट्रांसप्लांट प्रदेश में सिर्फ केजीएमयू में हो रहा है।

प्रो. सीएम सिंह ने बताया कि लिवर सिरोसिस, लिवर फेल्योर, रक्त कैंसर, थैलेसीमिया, एप्लास्टिक एनीमिया और अन्य गंभीर रक्त रोगों से पीड़ित मरीजों के लिए ट्रांसप्लांट ही अंतिम विकल्प होता है।

अभी ऐसे मरीजों को लंबी प्रतीक्षा सूची और अधिक खर्च का सामना करना पड़ता है। करीब 50 करोड़ रुपये की लागत से सेंटर फार ट्रांसप्लांट बनकर तैयार हो गया है और इसमें लगने वाले सभी जरूरी उपकरण की भी खरीदारी हो गई है। इसके पहले सुपर स्पेशलियटी डाक्टरों की भर्ती होगी।

शोध को भी मिलेगा बढ़ावा

प्रो. सीएम सिंह ने कहा, ट्रांसप्लांट सेंटर के संचालन से न केवल मरीजों को लाभ मिलेगा, बल्कि मेडिकल छात्रों, सुपर स्पेशियलिटी रेजिडेंट और शोधार्थियों को भी एडवांस प्रशिक्षण का अवसर मिलेगा। इससे प्रदेश में अंग प्रत्यारोपण सेवाओं का नेटवर्क मजबूत होगा और भविष्य में अन्य जटिल प्रत्यारोपण का रास्ता सरल होगा।

क्या है बोनमैरो ट्रांसप्लांट?

रक्त कैंसर, थैलेसीमिया, एप्लास्टिक एनीमिया जैसी गंभीर बीमारियों में क्षतिग्रस्त बोनमैरो को स्वस्थ बोनमैरो से बदलने की प्रक्रिया को बोनमैरो ट्रांसप्लांट कहा जाता है।

कब पड़ती है लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत?

लिवर फेल्योर, गंभीर सिरोसिस, कुछ प्रकार के लिवर कैंसर और जन्मजात लिवर रोगों में लिवर प्रत्यारोपण जीवनरक्षक उपचार माना जाता है।

संस्थान का एक साल का रिपोर्ट कार्ड

प्रो. सीएम सिंह ने इस दौरान संस्थान का एक साल का रिपोर्ट कार्ड भी प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि एक वर्ष में नौ लाख मरीज ओपीडी में देखे गए, जबकि 78 हजार रोगियों को भर्ती कर इलाज मुहैया कराया गया। वहीं 1.71 लाख मरीजों को इमरजेंसी में उपचार मिला। इस दौरान 39 हजार मरीजों की सर्जरी की गई और सात हजार सुरक्षित प्रसव कराया गया। मौजूदा समय में संस्थान में सीटी स्कैन, एमआरआइ, टूडी ईको और अल्ट्रासाउंड के लिए प्रतीक्षा सूची नहीं है। ये जांचे 24 घंटे के भीतर हो रही हैं।

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