अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो हफ्ते के युद्धविराम में पाकिस्तान की अहम भूमिका सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अपने बयान में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर को ‘प्रिय भाई’ बताते हुए उनके प्रयासों की सराहना की।
वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने भी इस भूमिका को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किया। पाकिस्तान ने ही दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता तैयार किया और सीजफायर तक पहुंचने में मदद की।
शहबाज शरीफ ने घोषणा की कि अमेरिका और ईरान ने तुरंत प्रभाव से युद्धविराम पर सहमति जताई है और आगे की बातचीत के लिए दोनों देशों को इस्लामाबाद आने का न्योता दिया गया है।
कैसे बना पाकिस्तान कूटनीति का केंद्र?
रिपोर्ट के अनुसार, सीजफायर से पहले पाकिस्तान लगातार बैकचैनल बातचीत में सक्रिय रहा। असीम मुनीर ने पूरी रात अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, दूत स्टीव विटकॉफ और ईरानी विदेश मंत्री से संपर्क बनाए रखा।
पाकिस्तान ने ही अमेरिका के 15 सूत्रीय प्रस्ताव को ईरान तक पहुंचाया और फिर ईरान के जवाब को अमेरिका तक भेजा। इस तरह उसने दोनों देशों के बीच सेतु का काम किया। 29 मार्च को पाकिस्तान ने तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों की बैठक भी कराई, जिसमें मध्य पूर्व संकट का हल निकालने पर चर्चा हुई।
क्यों दोनों देशों ने पाकिस्तान पर किया भरोसा?
किसी भी देश को मध्यस्थ बनने के लिए दोनों पक्षों का भरोसा जरूरी होता है। ईरान को अपने अरब पड़ोसियों पर भरोसा नहीं है, क्योंकि उनके अमेरिका से करीबी संबंध हैं। पाकिस्तान का ईरान के साथ अच्छा संबंध है और दोनों देशों की सीमा भी जुड़ी हुई है।
इसके अलावा पाकिस्तान के इजरायल से राजनयिक संबंध नहीं हैं, जो ईरान के लिए भरोसे की बड़ी वजह है। वहीं, अमेरिका के साथ भी पाकिस्तान के संबंध पिछले कुछ समय में बेहतर हुए हैं। असीम मुनीर के अमेरिका और ईरान दोनों के रक्षा तंत्र में संपर्क होने से पाकिस्तान को इस भूमिका में बढ़त मिली।
पाकिस्तान को भी था सीजफायर से फायदा
पाकिस्तान का सीजफायर के लिए प्रयास केवल कूटनीतिक भूमिका तक सीमित नहीं था, बल्कि उसके अपने हित भी जुड़े थे। देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मध्य पूर्व पर काफी निर्भर है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण ईंधन की कीमतें बढ़ीं, जिससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ा।
इसके अलावा बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा भी अहम मुद्दा है। देश पहले से आर्थिक संकट और अफगानिस्तान के साथ तनाव का सामना कर रहा है, ऐसे में एक और अस्थिर पड़ोसी उसके लिए नुकसानदेह होता।
चुनौतियां अभी भी बाकी
हालांकि, यह युद्धविराम अभी काफी नाजुक माना जा रहा है। अगर यह समझौता टूटता है, तो पाकिस्तान की कूटनीतिक साख को बड़ा झटका लग सकता है। इसके अलावा पाकिस्तान के पास इतना सामरिक प्रभाव नहीं है कि वह इस सीजफायर को लागू करा सके।
अगर फिर से संघर्ष शुरू होता है, तो पाकिस्तान के लिए संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में फिलहाल पाकिस्तान को कूटनीतिक सफलता जरूर मिली है, लेकिन आने वाले समय में इस समझौते की सफलता ही उसकी असली परीक्षा होगी।