बांग्लादेश में चुनाव से पहले अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा बढ़ने की आशंका जताई गई है, बीते सात महीनों में 116 हत्याएं दर्ज…

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा कोई नई बात नहीं है, लेकिन खुफिया एजेंसियों का कहना है कि मौजूदा दौर की हिंसा पहले से कहीं अधिक संगठित, योजनाबद्ध और लगातार जारी रहने वाली है।

भारतीय अधिकारियों के अनुसार, 2025 से अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाने की घटनाओं में तेज उछाल आया है और आने वाले चुनावों से पहले यह हिंसा और बढ़ सकती है।

भारत को उकसाने की कोशिश

खुफिया आकलन के अनुसार अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं को निशाना बनाना केवल बांग्लादेश को अल्पसंख्यक-मुक्त करने की कोशिश नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य भारत को उकसाना भी है।

अधिकारियों का कहना है कि शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में आई व्यवस्था में आइएसआइ-जमात गठजोड़ को इस अभियान को आगे बढ़ाने में आसानी मिली है, क्योंकि उन्हें रोकने का कोई प्रभावी दबाव नहीं दिखता।

एजेंसियों का मानना है कि चुनाव नजदीक आने के साथ जमात और उससे जुड़े दल अपने कट्टर समर्थक आधार को मजबूत करने के लिए अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा को और हवा दे सकते हैं। इसी कारण आने वाले महीनों में ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

बांग्लादेश में 116 अल्पसंख्यकों की हत्या

ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनारिटीज (एचआरसीबीएम) की रिपोर्ट के मुताबिक, 6 जून 2025 से 5 जनवरी 2026 के बीच अल्पसंख्यक समुदायों के 116 लोगों की हत्या की गई। खुफिया ब्यूरो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले दशकों से होते रहे हैं, लेकिन मौजूदा अभियान पूरी तरह अलग नजर आता है।

अधिकारी के मुताबिक, पहले हिंसा की घटनाएं किसी एक क्षेत्र तक सीमित रहती थीं और सरकारी हस्तक्षेप के बाद थम जाती थीं। लेकिन इस बार हिंसा देश के सभी 8 डिवीजनों और 45 जिलों में फैल चुकी है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमलावर तब तक रुकने वाले नहीं हैं, जब तक उनका उद्देश्य पूरा न हो जाए।

न्याय व्यवस्था पर सवाल

एचआरसीबीएम की रिपोर्ट में कहा गया है कि ये हत्याएं अलग-थलग घटनाएं नहीं, बल्कि संरचनात्मक हिंसा का हिस्सा हैं, जो लंबे समय से चले आ रहे भेदभाव और जनसांख्यिकीय बदलावों से जुड़ी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 1946 से 2020 के बीच बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की आबादी 30 प्रतिशत से घटकर 9 प्रतिशत रह गई है।

रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि यूनुस प्रशासन इन घटनाओं को व्यक्तिगत रंजिश या एकल मामलों के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, जबकि जांच में अधिकांश मामलों में जानबूझकर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की पुष्टि हुई है। रिपोर्ट के अनुसार कुल मामलों में 48 प्रतिशत टारगेटेड हत्याएं थीं, 10.9 प्रतिशत मामलों में भीड़ हिंसा में हत्याएं हुईं, 12.9 प्रतिशत संदिग्ध या अस्पष्टीकृत मौतें व्यापक हिंसा से जुड़ी रहीं, जबकि 6.9 प्रतिशत मौतें पुलिस या अन्य एजेंसियों की हिरासत में हुईं।

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