“दो भारत हैं-एक जो चंद्रमा तक पहुँचने का सपना देखता है और दूसरा जो गांवों में जीवन यापन करता है; हमें दोनों को समान रूप से विकास की राह पर आगे बढ़ाना चाहिए,” जुअल ओराम ने कहा…

दो भारत है एक चंद्रमा में पहुंचने वाला एक गांव में रहने वाला दोनों का महत्व है दोनों को आगे बढ़ाना है।

ये बात सोमवार को जनजाति मामलों के केंद्रीय मंत्री जुअल ओराम ने ट्राइब्स आर्ट फेस्ट के उद्घाटन संबोधन में भारत की विविधिता उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने आगे बढ़ाने की अपील करते हुए कही।

उन्होंने कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य पाने के लिए दोनों तरह के भारत को आगे बढ़ाना है उसे उजागर करना है तभी भारत विकसित भारत बनेगा।

केंद्रीय जनजाति मंत्री जुआल ओराम ने सोमवार को दिल्ली के त्रावणकोर पैलेस में जनजातीय कला उत्सव का उद्धाटन किया।

जनजातीय कला उत्सव का उद्घाटन

जनजातीय कला उत्सव के उद्घाटन संबोधन में केंद्रीय मंत्री जुआल ओराम ने भारत के कण कण में बसी विविध प्रकार की कलाओं की बात की और बताया कि कैसे हमारे जनजातीय कलाकारों ने इस कला को सहेजा है।

उन्होंने कहा कि दो भारत हैं एक चंद्रमा में पहुंचने वाला मंगल प्रोजेक्ट पर काम करने वाला भारत है दूसरा एक भारत है जो अभी भी गांव में है लेकिन उसका महत्व है।

उसने कला और संस्कृति को बचाए रखा है इन दोनों को उजागर करना आगे बढ़ाना आवश्यक है। तभी विकसित भारत होगा। उन्होंने प्रधानमंत्री का संदेश भी पढ़ा जिसमें कहा गया था कि हमारी जनजातियों की कला की भारत और पूरे विश्व में पहचान है।

इस मौके पर जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री दुर्गादास उइके भी मौजूद थे। उन्होंने मार्च महीने में करीब पूरे महीने तक चलने वाले जनजातीय कला महोत्सव के कुल पांच तरह के सम्मेलनों का ब्योरा देते हुए बताया कि ये कार्यक्रम जनजातीय समाज का गौरव है और ये कार्यक्रम सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन नहीं है बल्कि भारत की आत्मा को प्रस्तुत करने वाला कार्यक्रम है।

2 से 13 मार्च तक चलेगा उत्सव 

2 से 13 मार्च तक चलने वाले इस जनजाति कला उत्सव में देशभर की जनजातीय कला, परंपरा और सृजनशीलता का अद्भुत संगम दिखता है। इसमें 70 से अधिक प्रतिष्ठित जनजातीय कलाकार भाग ले रहे हैं और 30 विविध जनजातीय कला रूपों में लगभग 1000 कलाकृतियों का प्रदर्शन किया गया है।

उत्सव का उद्देश्य केवल कला प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनजातीय समुदायों के समावेशी विकास, सांस्कृतिक संरक्षण और आर्थिक सशक्तिकरण की व्यापक सोच को भी आगे बढ़ाता है।

जनजातीय कार्य मंत्रालय की पहल पर आयोजित यह कार्यक्रम जनजातीय कला और संस्कृति को राष्ट्रीय मंच प्रदान करने के साथ-साथ कलाकारों को प्रत्यक्ष विपणन और संवाद का अवसर भी उपलब्ध करा रहा है।

कला प्रदशर्नी में सोहराई आर्ट का भी प्रदर्शन

इस कला प्रदशर्नी में सोहराई आर्ट का भी प्रदर्शन है। सोहराई झारखंड के जनजाति समुदाय की कला है। ये सोराही आर्ट है जो एक प्रकार से दीपावली ही होती है।

इसमें जनजातीय समुदाय के लोग सोहराई पर्व पर अपनी कला को घरों पर उकेरते हैं और अब वह कला घरों से आगे बढ़कर कैनवास पर उतर कर कला प्रदर्शनी में लगी है।

इस कला की एक और खासियत है जो कार्यक्रम में आयीं सोहराई कलाकार अलका बताती हैं कि इसमें मिट्टी के प्राकृतिक रंगों का ही इस्तेमाल किया जाता है जैसे पीली मिट्टी, काली मिट्टी, लाल मिट्टी आदि।

इस मौके पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए जिसमें मेघालय की खासी जनजाति ने संगीत प्रस्तुत किया। अपनी भाषा में देशभक्ति और प्रकृति के वर्णन वाला मंत्रमुग्ध करने वाला संगीत ने लोगों का मन मोह लिया।

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