‘गंभीर मानसिक तनाव में थी महिला’, बच्चे की हत्या के मामले में सजा काट रही दोषी को कर्नाटक हाई कोर्ट ने किया बरी…

2016 में अपने 15 महीने के बच्चे का दम घोंटकर हत्या करने के आरोप में दोषी ठहराई गई और उम्रकैद की सजा पाई महिला को केरल हाई कोर्ट ने बरी कर दिया। मेंटल हेल्थकेयर एक्ट (मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम) के तहत इस महिला को बरी किया गया।

एक्ट के प्रावधानों का हवाला देते हुए, केरल हाई कोर्ट ने 2023 में सेशंस कोर्ट द्वारा दोषी ठहराई गई महिला को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि घटना के समय वह बहुत ज्यादा मानसिक तनाव में थी और उसने आत्महत्या की कोशिश की थी।

कोर्ट ने क्या कहा?

2018 में लागू हुए इस कानून के बारे में केरल हाई कोर्ट ने पहले कहा था कि यह पिछली तारीख से लागू होगा। इस मामले में हाई कोर्ट ने कहा कि 2021 में जब ट्रायल शुरू हुआ तब यह कानून लागू था और इसलिए सेशंस कोर्ट को इसे ध्यान में रखना चाहिए था। न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन वी और केवी जयकुमार की पीठ ने फैसला सुनाया।

अदालत ने कहा, “प्रथम दृष्टया ये हालात आत्महत्या की कोशिश के आरोप से जुड़े अहम सबूत थे। हालांकि, अभियोजन पक्ष ही बेहतर जानता है कि किन वजहों से आईपीसी की धारा 309 (आत्महत्या की कोशिश) के तहत लगे आरोप को साबित करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की गई।”

बेंच ने 8 जून के अपने फैसले में कहा, “इन हालात को देखते हुए हमारी यह राय है कि मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 की धारा 115 (आत्महत्या की कोशिश के मामले में गंभीर तनाव का अनुमान) के प्रावधान इस मामले के तथ्यों पर पूरी तरह लागू होंगे। इसलिए, अपीलकर्ता (आरोपी) को मानसिक तनाव में माना जाएगा और उसे आईपीसी के तहत किसी भी अपराध के लिए सजा नहीं दी जा सकती थी।”

अभियोजन पक्ष ने क्या तर्क दिया?

अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया था कि चूंकि आरोपी को आईपीसी की धारा 309 के तहत अपराध से बरी कर दिया गया था, इसलिए मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 की धारा 115 के तहत बताई गई कानूनी धारणा इस मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होगी।

हाई कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि ट्रायल कोर्ट के सामने बहस के दौरान अभियोजन पक्ष ने खुद ही आईपीसी की धारा 309 के तहत लगे आरोप पर गंभीरता से पैरवी नहीं की थी।

बेंच ने क्या कहकर खारिज किया तर्क?

अदालत ने कहा, “हमें यह भी पता चला है कि आईपीसी की धारा 309 के तहत अपील करने वाले को बरी करने का आधार यह ठोस निष्कर्ष नहीं था कि आत्महत्या की कोई कोशिश नहीं की गई थी। इसके उलट ऐसा लगता है कि सेशंस जज ने सरकारी वकील की बात मान ली और इस आधार पर फैसला किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि आरोपी को लगी चोटें सामान्य तौर पर मौत का कारण बनने के लिए काफी थीं। हमारी नजर में ऐसा नजरिया कानूनी रूप से सही नहीं है।”

बेंच ने कहा कि सेशंस जज का यह तर्क मानने लायक नहीं है कि आईपीसी की धारा 309 के तहत अपराध इसलिए नहीं बनता क्योंकि कलाइयों और कोहनियों पर लगी चोटें मौत का कारण बनने के लिए काफी नहीं थीं।

पीठ ने कहा, “इस तरह की व्याख्या प्रावधान की सीधी-सादी भाषा से आगे जाती है और आत्महत्या की कोशिश तथा किए गए कामों से मौत होने की असल संभावना के बीच के फर्क को नजरअंदाज करती है।”

इसमें कहा गया है, “आईपीसी की धारा 309 का मुख्य फोकस आत्महत्या की कोशिश और उसे अंजाम देने के लिए की गई गतिविधियों पर है, न कि पहुंचाई गई चोटों की गंभीरता या जानलेवा क्षमता पर।”

उच्च न्यायालय ने महिला की अपील स्वीकार कर ली और उसकी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को रद कर दिया। महिला ने सेशन कोर्ट के नवंबर 2023 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे फरवरी 2016 में अपने बच्चे की हत्या के लिए दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

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