पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने की पहल राज्यों को ही करनी होगी। राज्य चाहे तो इस मुद्दे पर जीएसटी काउंसिल में बहस शुरू कर सकते हैं।
वित्त मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि केंद्र की तरफ से पेट्रोल व डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने की पहल नहीं की जाएगी।
पेट्रोल व डीजल की खुदरा कीमतों में पिछले एक माह में 7.50 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी के बाद एक बार फिर से इन्हें जीएसटी के दायरे में लाने की चर्चा तेज हो गई है।
अभी पट्रोल-डीजल पर लगता है 45% से ज्यादा टैक्स
पेट्रोल व डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने के बाद इन पर अधिकतम 28 प्रतिशत का शुल्क लगेगा। अभी केंद्र सरकार की तरफ से उत्पाद शुल्क तो राज्यों की तरफ से वैट व विभिन्न प्रकार के सेस को मिलाकर इनकी खुदरा कीमतों में 45 प्रतिशत से अधिक का टैक्स लगता है।
हालांकि आम उपभोक्ता को पेट्रोल व डीजल के दाम में राहत दिलाने के कई राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों द्वारा राज्यों से वैट में कटौती की मांग भी की जा रही है।
वैट कटौती के लिए केंद्र ने राज्यों से नहीं कहा
मंत्रालय सूत्रों का कहना है कि वैट में कटौती के लिए केंद्र की तरफ से राज्यों को नहीं कहा गया है और आगे भी कोई योजना नहीं है। पेट्रोल व डीजल के दाम बढ़ने पर हमेशा राजनीतिक पार्टियों की तरफ से राज्यों के वैट घटाने की आवाज उठाई जाने लगती हैं। सभी राज्यों में अलग-अलग वैट की दर है। फिलहाल 22 राज्यों में भाजपा शासित सरकार हैं।
पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी तेल की कीमतें
पश्चिम एशिया संकट से कच्चे तेल के बढ़ते दाम और उससे घरेलू स्तर पर पेट्रोल व डीजल की खुदरा कीमतें बढ़ रही हैं और इनके खुदरा दाम में अभी और इजाफा हो सकता है। फिलहाल तेल मार्केटिंग कंपनियां रोजाना 500-600 करोड़ रुपये का घाटा उठा रही है।
ईरान युद्ध के आरंभ होने के पहले 78 दिनों तक पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमत में बढ़ोतरी को रोकने के लिए केंद्र ने आयल मार्केटिंग कंपनियों को 1.23 लाख करोड़ रुपये की सहायता दी, लेकिन अब केंद्र खुदरा कीमत रोकने के लिए मार्केटिंग कंपनियों को कोई वित्तीय मदद नहीं देने जा रहा है।