सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा, “जांच पूरी करने के लिए समयसीमा तय करना अपवाद है, नियम नहीं”…

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एजेंसियों को अदालतों द्वारा समयसीमा के भीतर जांच पूरी करने के लिए कहना एक अपवाद है। यह कोई सामान्य नियम नहीं है।

अदालतों द्वारा समयसीमा प्रतिक्रियात्मक रूप से निर्धारित की जाती है, न कि निवारक रूप में, जहां अत्यधिक देरी से पूर्वाग्रह उत्पन्न हो सकता है।

जस्टिस संजय करोल और एनके सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश को निरस्त करते हुए की। हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को कथित रूप से दस्तावेज में हेरफेर कर हथियारों का लाइसेंस प्राप्त करने के मामले में जांच पूरी करने के लिए 90 दिन का समय दिया था और आरोपित को किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण प्रदान किया था।

पीठ ने कहा-संक्षेप में, समयसीमा प्रतिक्रियात्मक रूप से निर्धारित की जाती है, न कि निवारक रूप से। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का विश्लेषण करते हुए यह भी कहा कि अदालतों ने लगातार यह स्वीकार किया है कि समयबद्ध जांच का निर्देश देना नियम नहीं, बल्कि अपवाद होना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने कहा कि इसी संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में अदालतों ने उपयुक्त मामलों में हस्तक्षेप किया है, जहां जांच में देरी स्वयं ही पूर्वाग्रह का कारण बनने लगती है। इन टिप्पणियों के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया।

पीठ ने कहा-अदालतें जांच की व्यावहारिक वास्तविकताओं का सम्मान करती हैं, फिर भी हस्तक्षेप करती हैं, जहां देरी निष्पक्षता, स्वतंत्रता या आपराधिक न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता को खतरे में डालती है।

शीर्ष न्यायालय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उन आदेशों को भी गलत पाया, जिनमें आरोपित को किसी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपित को अगले दो सप्ताह तक सुरक्षा प्रदान की जाए, जिसके बाद कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

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