अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा के दौरान चीन ने ताइवान मुद्दे पर बेहद सख्त रुख अपनाया। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साफ कहा कि अगर ताइवान के मुद्दे को सही तरीके से नहीं संभाला गया तो अमेरिका और चीन के बीच टकराव और संघर्ष हो सकता है।
चीनी विदेश मंत्रालय के अनुसार, शी जिनपिंग ने ट्रंप से कहा कि ताइवान का मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों में सबसे अहम सवाल है। उन्होंने कहा कि ताइवान की स्वतंत्रता और ताइवान जलडमरूमध्य में शांति आग और पानी की तरह एक-दूसरे के विपरीत हैं।
बीजिंग में ट्रंप के स्वागत के दौरान चीन ने अपनी सैन्य ताकत का भी खुला प्रदर्शन किया। ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में लाल कालीन, सैकड़ों सैनिकों की परेड और भव्य समारोह के जरिए चीन ने दुनिया को संदेश देने की कोशिश की कि अब वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है।
चीन के शक्ति प्रदर्शन के बीच बदले दिखे ट्रंप
समारोह के दौरान ट्रंप ने चीन की सेना को लेकर कहा, “मिलिट्री तो साफ दिखाई दे रही है।” यह बयान सामान्य लग सकता है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के लहजे में इस बार चीन की ताकत को लेकर स्वीकार्यता और सम्मान दोनों दिखाई दिए।
अमेरिका लंबे समय तक दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति माना जाता रहा है, खासकर सोवियत संघ के टूटने के बाद। लेकिन अब चीन तेजी से अपनी सैन्य, तकनीकी और रणनीतिक ताकत बढ़ा रहा है। बीजिंग में ट्रंप की यात्रा केवल राजनयिक मुलाकात नहीं, बल्कि चीन की बढ़ती वैश्विक शक्ति का प्रदर्शन भी मानी जा रही है।
ट्रंप ने यात्रा के दौरान कई बार शी जिनपिंग को “महान नेता” बताया। आमतौर पर दूसरे नेताओं के साथ आक्रामक अंदाज में दिखने वाले ट्रंप इस बार अपेक्षाकृत शांत और संयमित नजर आए।
ताइवान बना सबसे बड़ा तनाव बिंदु
चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान खुद को अलग लोकतांत्रिक सरकार वाला क्षेत्र बताता है। अमेरिका लंबे समय से ताइवान को सैन्य और राजनीतिक समर्थन देता रहा है। इसी वजह से ताइवान अमेरिका-चीन रिश्तों का सबसे संवेदनशील मुद्दा बन चुका है।
चीन की चेतावनी के जवाब में ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा खुद बीजिंग है। ताइवान ने चीन पर लगातार सैन्य दबाव और डराने की रणनीति अपनाने का आरोप लगाया। ताइवान ने यह भी कहा कि चीन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ताइवान की ओर से बोलने का कोई अधिकार नहीं है।
ईरान युद्ध में भी दिखा चीन का असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के दौरान भी चीन की तकनीक का असर दिखाई दिया। बताया गया कि ईरान ने चीन के ‘बेइदौ’ सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल ड्रोन संचालन और निशाना साधने में किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध अब केवल टैंकों, लड़ाकू विमानों और जहाजों से नहीं लड़े जाते। अब ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर तकनीक, सैटेलाइट नेटवर्क और डिजिटल सिस्टम युद्ध का सबसे बड़ा हथियार बन चुके हैं।
इसी क्षेत्र में चीन तेजी से अमेरिका को चुनौती दे रहा है। चीन अब केवल अपने लिए हथियार नहीं बना रहा, बल्कि उसकी तकनीक दूसरे देशों के युद्धों को भी प्रभावित कर रही है।
आधुनिक युद्ध का नया चेहरा
अमेरिका अभी भी रक्षा खर्च में दुनिया में सबसे आगे है, लेकिन चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी स्थायी सेना है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य के युद्ध केवल सैनिकों की संख्या से नहीं, बल्कि तकनीकी क्षमता से तय होंगे।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने ईरान युद्ध में हजारों मिसाइल और ड्रोन इस्तेमाल किए, जिससे उसके हथियार भंडार पर दबाव बढ़ गया। कई रणनीतिक विशेषज्ञों को चिंता है कि अगर चीन के साथ लंबा संघर्ष हुआ तो अमेरिका के पास पर्याप्त लंबी दूरी की मिसाइलें और हथियार कम पड़ सकते हैं।
बताया गया कि कुछ आधुनिक हथियारों को तैयार करने में तीन से चार साल तक लग जाते हैं। इसके विपरीत चीन अपनी सैन्य उत्पादन क्षमता को युद्ध स्तर पर तेजी से बढ़ा रहा है।
ड्रोन और एआई पर टिकी भविष्य की लड़ाई
रिपोर्ट में कहा गया कि भविष्य के युद्ध स्मार्ट सिस्टम से तय होंगे। इसमें शामिल हैं:-
- ड्रोन और मानव रहित हथियार
- एआई आधारित टारगेट सिस्टम
- साइबर युद्ध तकनीक
- सैटेलाइट नेविगेशन
- इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली
अमेरिकी रक्षा विभाग अब ‘हेलस्केप’ नाम की नई रणनीति पर काम कर रहा है। इसका उद्देश्य ताइवान जलडमरूमध्य को इतने बड़े ड्रोन और स्वचालित हथियार नेटवर्क में बदल देना है कि चीन के लिए हमला करना बेहद महंगा और मुश्किल हो जाए। रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के युद्ध वही देश जीतेंगे जो बड़ी संख्या में सस्ते लेकिन स्मार्ट हथियार तेजी से बना सकेंगे।
अमेरिका के सामने नई चुनौती
सीएसआईएस की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता अब केवल चीन की सेना नहीं, बल्कि उसकी औद्योगिक क्षमता बनती जा रही है। चीन तेजी से युद्धपोत, मिसाइल, ड्रोन, साइबर सिस्टम और एआई तकनीक तैयार कर रहा है। रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका को अब दूसरे विश्व युद्ध जैसी औद्योगिक तैयारी की जरूरत है, ताकि वह हथियार उत्पादन और सप्लाई चेन को मजबूत कर सके।